santoshi mata vrat katha

श्री संतोषी माता की व्रत कथा || Shri Santoshi Mata Ki Vrat Katha || शुक्रवार की व्रत कथा

श्री संतोषी माता की व्रत कथा – Shri Santoshi Mata Ki Vrat Katha – शुक्रवार की व्रत कथा


श्री संतोषी माता
व्रत करने की विधि Santoshi Mata Katha vidhi

आइये जानते हैं Santoshi Mata व्रत और कथा की विधि :

इस व्रत को करने वाला कथा कहते वह सुनते समय हाथ में गुड़ व भुने हुए चने रखेा। कथा समाप्त होने पर कथा का गुड़-चना गौ माता को खिलायें।

कलश में रखा हुआ गुड़-चना सब को प्रसाद के रूप में बांट दें। कथा से पहले कलश को जल से भरें। उसके ऊपर गुड़-चने से भरा कटोरा रखें। 

कथा समाप्त होने और आरती होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगहों पर छिड़कें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डाल देवें।

सवा आने का गुण चना लेकर माता का व्रत करें। सवा पैसे का ले तो कोई आपत्ति नहीं। गुड़ घर में हो तो ले लेवें, विचार न करें।  क्योंकि माता भावना की भूखी है, कम ज्यादा का कोई विचार नहीं, इसलिए जितना भी बन पड़े अर्पण करें। 

श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न मन हो व्रत करना चाहिए।  व्रत के उद्यापन में अढ़ाई सेर खाजा मोमनदार पूड़ी, खीर, चने का साग नैवेद्य रखें। घी का दीपक जलाकर संतोषी माता की जय जयकार बोलकर नारियल फोड़ें। 

इस दिन घर में कोई खटाई ना खावे और न आप खावें न किसी दूसरे को खाने दें।

इस दिन आठ लड़कों को भोजन करावें। देवर, जेठ, घर के कुटुंब के लड़के मिलते हो तो दूसरों को बुलाना नहीं चाहिए। कुटुंब में ना मिले तो, ब्राह्मणों के, रिश्तेदारों के या पड़ोसियों के लड़के बुलावे।

उन्हें खटाई की कोई वस्तु न दें तथा भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देवें। नगद पैसे ना दें बल्कि कोई वस्तु दक्षिणा में दें।

व्रत करने वाला कथा सुन प्रसाद ले तथा एक ही समय भोजन करे। इस तरह से माता अत्यंत खुश होंगी और दुख, दरिद्रता दूर कर मनोकामना पूरी होगी।

Santoshi Mata Ki Vrat Katha | संतोषी माता की व्रत कथा

श्री Santoshi Mata व्रत की कथा :

एक बुढ़िया थी और उसके सात पुत्र थे। छ: कमाने के वाले थे एक निकम्मा था। बुढ़िया मां छ: पुत्रों की रसोई बनाती, भोजन कराती और पीछे से जो बचता उसे सातवें को दे देती। परंतु वह बहुत भोला था, मन में बुरा नहीं मानता था।

एक दिन अपनी बहू से बोला देखो मेरी माता का मुझ पर कितना प्यार है। वह बोली क्यों नहीं, सब का झूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है। वह बोला ऐसा भी कहीं हो सकता है, मैं जब तक अपनी आंखों से न देखूँ  मान नहीं सकता। बहू ने कहा देख लोगे तब तो मानोगे।

कुछ दिन बाद बड़ा त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड्डू बने। वह जांचने को सिर दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई में सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा।

छहो भाई भोजन करने आए, उसने देखा मां ने उनके लिए सुंदर-सुंदर आसन बिछाए हैं, सात प्रकार की रसोई परोसी है। वह आग्रह कर उन्हें जिमाती है। वह देखता रहा।

भाई भोजन करके उठे। तब झूठी थालियों में से लड्डुओं के टुकड़ों को उठाया और लड्डू बनाया, जूठन साफ कर बुढ़िया मां ने पुकारा उठ बेटा, छहो भाई भोजन कर गए, अब तू ही बाकी है। उठ न, कब खाएगा।

वह कहने लगा मां मुझे भूख नहीं। भोजन नहीं करना। मैं परदेस जा रहा हूं। माता ने कहा कल जाता हो तो आज ही चला जा। वह बोला हां हां आज ही जा रहा हूं। यह कह कर वह घर से निकल गया।

चलते-चलते बहू की याद आई। वह गौशाला में कंडे थाप रही थी। जाकर बोला मेरे पास तो कुछ नहीं है बस यह अंगूठी है, सो ले लो और अपनी कुछ निशानी मुझे दे दो। वह बोली मेरे पास क्या है, यह गोबर भरा हाथ है। यह कह कर उसके पीठ में गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया।

चलते-चलते दूर देश में पहुंचा। वहां एक साहूकार की दुकान थी। वही जाकर कहने लगा भाई मुझे नौकरी पर रख लो। साहूकार को जरूरत थी सो वह बोला रह जा। लड़के ने पूछा तनखा क्या दोगे? साहूकार ने कहा काम देखकर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली।

वह सवेरे से रात तक नौकरी करने लगा। कुछ दिनों में दुकान का लेन-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना, सारा काम वह करने लगा।

साहूकार के सात आठ नौकर और थे। सब चक्कर खाने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया। सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में उसे आधे मुनाफे का साझीदार बना लिया। वह बारह वर्ष में नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उसके ऊपर छोड़ कर बाहर चला गया।

अब बहू पर क्या बीती सुनो। सास-ससुर उसे दुख देने लगे सारे गृहस्थी का काम कराकर उसे लकड़ी लेने जंगल भेजते और घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल की खोपरे में पानी दिया जाता।

इस तरह दिन बीतते रहे। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी कि रास्ते में बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दीं। वह खड़ी हो कथा सुनकर बोली, बहनों तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने से क्या फल होता है?

इस व्रत के करने की क्या विधि है? यदि तुम अपने इस व्रत का विधान मुझे समझा कर कहोगी तो मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगी।

तब उनमें से एक स्त्री बोली सुनो संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता-दरिद्रता का नाश होता है, लक्ष्मी आती हैं, मन की चिंताएं दूर होती हैं, घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है, निपुत्र को पुत्र मिलता है।

पति बाहर गया हो तो जल्दी आ जाता है, कुंवारी कन्या को मनपसंद वर मिलता है, राजद्वार में बहुत दिनों से मुकदमा चलता हो तो खत्म हो जाता है, सब तरह सुख-शांति होती है, घर में धन जमा होता है जायजाद-पैसा का लाभ होता है, रोग दूर होता है तथा मन में जो कामना हो वह भी पूरी हो जाती है इसमें संदेह नहीं।

वह पूछने लगी यह व्रत कैसे किया जाता है, यह भी तो बताओ। आपकी बड़ी कृपा होगी।

स्त्री कहने लगी सवा आने का गुड़ चना लेना। इच्छा हो तो सवा पॉंच आने का लेना या सवा रुपए का भी सहूलियत के अनुसार लेना।

बिना परेशानी श्रद्धा और प्रेम से जितना बन सके लेना। सवा पैसे से सवा पॉंच आना तथा इससे भी ज्‍यादा शक्ति और भक्ति अनुसार लेना। हर शुक्रवार को निराहार रहकर कथा कहना। कथा के बीच में क्रम टूटे नहीं।

लगातार नियम पालन करना। सुनने वाला कोई ना मिले तो घी का दीपक जला उसके आगे जल के पात्र को रख कथा कहना, परंतु कथा कहने का नियम न टूटे। जब तक कार्य सिद्धि ना हो नियम पालन करना और कार्य सिद्ध हो जाने पर व्रत का उद्यापन करना।

तीन माह में माता फल पूरा करती हैं। यदि किसी के खोटे ग्रह हो तो भी माता तीन वर्ष में कार्य को अवश्य सिद्ध कर देती हैं। कार्य होने पर ही उद्यापन करना चाहिए बीच में नहीं करना चाहिए।

उद्यापन में अढ़ाई सेर आटे का खाजा तथा इसी अनुपात में खीर तथा चने का साग करना। आठ लड़कों को भोजन कराना। जहां तक मिले देवर, जेठ, भाई-बंधु के लड़के लेना, ना मिले तो रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लड़के बुलाना। उन्हें भोजन कराना, यथाशक्ति दक्षिणा देना।

माता का नियम पूरा करना। उस दिन घर में कोई खटाई ना खाए।

यह सुनकर बहू चल दी। रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया और उस पैसे से गुड़ चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देख पूछने लगी यह मंदिर किसका है? सब बच्चे कहने लगे संतोषी माता का मंदिर है।

यह सुन माता के मंदिर में जा माता के चरणों में लोटने लगी। दीन हो विनती करने लगी मां में निपट मूर्ख व्रत के नियम को जानती नहीं, मैं बहुत दुखी हूं माता, जगजननी मेरा दुख दूर कर मैं तेरी शरण में हूं।

माता को दया आई। एक शुक्रवार बीता कि दूसरे शुक्रवार को ही उसके पति का पत्र आया और तीसरे को उसका भेजा पैसा भी पहुंचा यह देख जेठानी मुंह सिकोड़ने लगी  इतने दिनों में इतना पैसा आया इसमें क्या बड़ाई है? लड़के ताना देने लगे काकी के पास पत्र आने लगे और रुपया  आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी, तब तो काकी बोलने से भी नहीं बोलेगी।

बेचारी सरलता से कहती भैया पत्र आवे, रुपया आवे तो हम सबके लिए अच्छा है ऐसा कह कर आंखों में आंसू भर कर संतोषी माता के मंदिर में मातेश्वरी के चरणों में गिर कर रोने लगी।

मां मैंने तुमसे पैसा नहीं मांगा, मुझे पैसे से क्या काम है? मुझे तो अपने सुहाग से काम है। मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा मांगती हूं। तब माता ने प्रसन्न होकर कहा जा बेटी तेरा स्वामी आएगा।

यह सुन खुशी से बावली हो घर में जाकर काम करने लगी। अब संतोषी मां विचार करने लगी इस भोली पुत्री से मैंने कह तो दिया तेरा पति आवेगा पर आवेगा कहां से? वह तो उसे स्वप्न में भी याद नहीं करता। उसे याद दिलाने के लिए मुझे जाना पड़ेगा।

इस तरह माता बुढ़िया के बेटे के पास जा स्वप्न में प्रकट हो कहने लगी साहूकार के बेटे सोता है या जागता है? वह बोला माता सोता भी नहीं हूँ और जागता भी नहीं हूं बीच में ही हूं कहो क्या आज्ञा है?
मां कहने लगी तेरा घर बार कुछ है या नहीं? वह बोला मेरा सब कुछ है मां, बाप, भाई, बहन, व बहू। क्या कमी है?

मां बोली भोले पुत्र तेरी स्‍त्री कष्ट उठा रही है, मां-बाप उसे कष्ट दे रहे हैं, दुख दे रहे हैं वह तेरे लिए तरस रही है। तू उसकी सुधि‍ ले। वह बोला माता यह तो मालूम है, परंतु जाऊं कैसे? परदेश की बात है, लेन-देन का कोई हिसाब नहीं।

जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। कैसे चला जाऊं? मां कहने लगी मेरी बात मान सवेरे नहा धोकर माता का नाम ले घी का दीपक जला दंडवत कर दुकान पर जा बैठना। तब देखते देखते तेरा लेनदेन सब हो जाएगा, माल बिक जाएगा और शाम होते-होते धन का ढेर लग जाएगा।

तब सवेरे बहुत जल्दी उठ उसने लोगों से अपने सपने की बात कही तो वे सब उसकी बात को अनसुनी करके खिल्ली उड़ाने लगे कहीं सपने सच होते हैं।

एक बूढ़ा बोला भाई मेरी बात मान इस तरह सच झूठ कहने के बदले देवता ने जैसा कहा है वैसा ही करना तेरा इसमें क्या जाता है। अब बूढ़े की बात मानकर वह नहा धोकर संतोषी माता को दंडवत कर घी का दीपक जला दुकान पर जा बैठा।

थोड़ी देर में क्या देखता है कि देने वाले रुपया लाए, लेने वाले हिसाब लेने लगे, कोठे में भरे सामानों के खरीददार नकद दाम में सौदा करने लगे और शाम तक धन का ढेर लग गया। माता का नाम ले घर ले जाने के वास्ते गहना कपड़ा खरीदने लगा और वहां से काम से निपट तुरंत घर को रवाना हुआ।

वहां बहू बेचारी जंगल में लकड़ी लेने जाती है। लौटते वक्त माताजी के मंदिर में विश्राम करती है। वह तो उसका रोज रुकने का स्थान जो ठहरा। दूर से धूल उड़ती देख माता से पूछती है माता धूल कैसे उड़ रही है? मां कहती है पुत्री तेरा पति आ रहा है।

अब तू ऐसा कर लकड़ियों के तीन बोझ बना ले, एक नदी के किनारे रख, दूसरा मेरे मंदिर पर और तीसरा अपने सिर पर रख। तेरे पति को लकड़ी का गट्ठा देख कर मोह पैदा होगा। वह यहॉं रुकेगा, नाश्ता पानी बना, खा पीकर मां से मिलने जाएगा।

तब तू लकड़ी का बोझ उठाकर जाना और बोझ आंगन में डाल कर दरवाजे पर जोर से लगाना, लो सासूजी लकड़ियों का गट्ठर लो, भूसी की रोटी दो और नारियल के खोपड़े में पानी दो, आज मेहमान कौन आया है?

मां की बात सुन बहुत अच्छा माता कहकर प्रसन्न हो लकड़ियों के तीन गटठे ले आई, एक नदी के तट पर, एक माता के मंदिर पर रखा। इतने में एक मुसाफिर वहॉं आ पहुँचा। सूखी लकड़ी देख उसकी इच्‍छा हुई कि यहीं निवास करे और भोजन बना कर खापीकर गॉंव जायेा इस प्रकार भोजन बना कर विश्राम ले, गॉंव को गया, सबसे प्रेम से मिला उसी समय बहू सिर पर लकड़ी का गट्ठा लिये आती है।

लकड़ी का भारी बोझ आंगन में डाल जोर से तीन आवाज देती है … लो सासू जी! लकड़ी का गट्ठा लो, भूसी की रोटी दो, नारियल के खोपड़े में पानी दो।

आज मेहमान कौन आया है? यह सुनकर उसकी सास अपने दिये हुए कष्‍टाों को भुलाने हेतु कहती है … बहू ऐसा क्यों कहती है, तेरा मालिक ही तो आया है। आ बैठ, मीठा भात खा, भोजन कर, कपड़े गहने पहन।

इतने में आवाज सुन उसका स्वामी बाहर आता है और अंगूठी देख व्याकुल हो मां से पूछता है -मां यह कौन है? मां कहती है बेटा तेरी बहू है।

आज बारह वर्ष हो गए तू जब से गया है, तब से सारे गांव में जानवर की तरह भटकती फिरती है, कामकाज घर का कुछ करती नहीं, चार समय आ कर खा जाती है।

अब तुझे देखकर भूसी की रोटी और नारियल की खोपड़ी में पानी मांगती है। वह लज्जित होकर बोला ठीक है मैंने इसे भी देखा है और तुम्हें भी देखा है। अब मुझे दूसरे घर की ताली दो तो उसमें रहूं।

तब मॉं बोली ठीक है बेटा जैसी तेरी मर्जी। कहकर ताली का गुच्छा पटक दिया। उसने ताली ले दूसरे कमरे में जो तीसरी मंजिल के ऊपर था खोलकर सारा सामान जमाया। एक दिन में ही वहां राजा के महल जैसा ठाठ बाट बन गया।

अब क्या था वह दोनों सुख पूर्वक रहने लगे। इतने में अगला शुक्रवार आया। बहू ने अपने पति से कहा कि मुझको माता का उद्यापन करना है। पति बोला बहुत अच्छा, खुशी से करो। वह तुरंत ही उद्यापन की तैयारी करने लगी। 

जेठ के लड़कों को भोजन के लिए कहने गई। उन्होंने मंजूर किया परंतु जेठानी अपने बच्चों को सिखाती है देखो रे! भोजन के बाद सब लोग खटाई मांगना जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो।

लड़के भोजन करने आए। खीर पेट भर कर खाई परंतु याद आते हैं कहने लगे हमें कुछ खटाई दो फिर खाना हमें भाता नहीं देखकर अरुचि होती है।

बहू कहने लगी खटाई किसी को नहीं दी जाएगी। यह तो संतोषी माता का प्रसाद है। लड़के उठ खड़े हुए और बोले पैसा लाओ। भोली बहु कुछ जानती नहीं थी तो उन्हें पैसे दे दिए। लड़के उसी समय हठ करके इमली लाकर खाने लगे।

यह देखकर बहू पर माताजी ने कोप  किया। राजा के दूत उसके पति को पकड़ कर ले गए। जेठ जेठानी मनमाने खोटे वचन कहने लगे।लूट कर धन इकट्ठा कर लाया था, सो राजा के दूत उसको पकड़ कर ले गए। अब मालूम पड़ जाएगा जब जेल की मार खाएगा।

बहू से यह वचन सहन नहीं हुए। रोती रोती माता के मंदिर में गई और बोली हे माता तुमने यह क्या किया? हंसा कर क्यों रुलाने लगी?

माता बोली पुत्री तूने उद्यापन करके मेरा व्रत भंग किया। इतनी जल्दी सब बातें भुला दी। वह कहने लगी माता भूली तो नहीं हूँ? न कुछ अपराध किया है। मुझे तो लड़कों ने भूल में डाल दिया। मैंने भूल से उन्हें पैसे दे दिए। मुझे क्षमा करो मां।

मां बोली ऐसी भी कहीं भूल होती है। वह बोली मां मुझे माफ कर दो। मैं फिर से तुम्हारा उद्यापन करूंगी। मां बोली भूल मत जाना। वह बोली अब भूल न होगी मां। अब बताओ वे कैसे आएंगे। मां बोली तेरा मालिक तुझे रास्ते में आता मिलेगा।

वह घर की ओर चली राह में पति आता मिला। उसने पूछा तुम कहां गए थे। तब वह कहने लगा इतना धन जो कमाया है, उसका टैक्स राजा ने मांगा था, वह भरने गया था। वह प्रसन्न हो बोली भला हुआ अब घर को चलो। कुछ दिन बाद फिर शुक्रवार आया।

वह बोली मुझे माता का उद्यापन करना है। पति ने कहा करो।  फिर जेठ के लड़कों से भोजन को कहने गई।

जेठानी ने एक दो बातें सुनाई। लड़कों को सिखा दिया कि पहले ही खटाई मांगने लगना। लड़के कहने लगे हमें खीर नहीं भाता, जी बिगड़ता है, कुछ खटाई खाने को देना। वह बोली खटाई खाने को नहीं मिलेगा, खाना हो तो खाओ।

वह ब्राह्मण के लड़कों को लेकर भोजन कराने लगी। यथाशक्ति दक्षिणा की जगह एक एक फल उन्हें दिया। इससे संतोषी मां प्रसन्‍न हुई । माता की कृपा होते ही नौवे मास उसको चंद्रमा के समान सुंदर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को लेकर प्रतिदिन माता के मंदिर जाने लगी।

मॉं ने सोचा कि वह रोज आती है आज क्यों ना मैं इसके घर चलूँ। इसका आसरा देखूँ तो सही। यह विचार कर माता ने भयानक रूप बनाया। गुड़ और चने से सना मुख ऊपर सूर्य के समान होठ उस पर मक्खियां भिनभिना रही हैं।

दहलीज में पांव रखते ही सास चिल्‍लाई देखो रे कोई चुड़ैल चली आ रही है। लड़कों इसे भगाओ नहीं तो किसी को खा जाएगी। लड़के डरने लगे और चिल्लाकर खिड़की बंद करने लगे। बहु रोशनदान से देख रही थी। प्रसन्‍नता से पागल होकर चिल्लाने लगी। आज मेरी माता घर आई है यह कह कर बच्चे को दूध पीने से हटाती है। इतने में सास का क्रोध फूट पड़ा।

इसे देखकर कैसी उतावली हुई है जो बच्चे को पटक दिया। इतने में मां के प्रताप से जहां देखो वहीं लड़के ही लड़के नजर आने लगे। वह बोली मां जी जिनका मैं व्रत करती हूं यह वही संतोषी माता है। इतना कह कर झट से सारे घर के किवाड़ खोल देती है। सबने माता के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे हैं माता हम मूर्ख हैं।

हम अज्ञानी हैं, पापी हैं, तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जानते। तुम्हारा व्रत भंग कर हमने बड़ा अपराध किया है, हे माता आप हमारे अपराध को क्षमा करो। इस प्रकार माता प्रसन्न हुई। माता ने बहू को जैसा फल दिया वैसा माता सबको दे। जो पढ़े उसका मनोरथ पूर्ण हो। बोलो संतोषी माता की जय। ( Santoshi Mata Ki Jai ) |


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Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi font ( श्री सत्य नारायण व्रत कथा )

Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi font ( श्री सत्य नारायण व्रत कथा ) – Shri Satya Narayan Vrat Katha is one of the most important vrat katha of Lord Shri Hari.

Shri Satyanarayan Katha in hindi is in full five chapters. Below are the five chapters!

पहला अध्याय

shri satyanarayan vrat katha in hindi – Chapter1

श्रीव्यास जी ने कहा – एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूत जी महाराज से पूछा – महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं, आप कहें।

श्री सूतजी बोले – इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान कमलापति ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूं, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश दुख भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनके दुखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक गये।

वहां चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्लवर्ण भगवान श्री नारायण का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे।

नारद जी बोले – हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य और अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणगणों से सम्पन्न, स्थावर-जंगमात्मक निखिल सृष्टिप्रपंच के कारणभूत तथा भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन! आपको नमस्कार है।

स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउंगा।

नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें।

श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं, सुनें।

हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूं। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे।

नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।

दूसरा अध्याय

shri satyanarayan vrat katha in hindi – chapter 2

श्रीसूतजी बोले – हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भलीभांति विस्तारपूर्वक कहूंगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था।

भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा – हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं।

ब्राह्मण बोला – प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूं और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूं। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये।

वृद्ध ब्राह्मण बोला – हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूंगा’ – यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी।

अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया।

इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया।

हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं?

हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।

श्री सूत जी बोले – मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ।

इसी बीच एक लकड़हारा वहां आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये।

विप्र ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया।

सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहां धन-सम्पन्न लोग रहते थे।

उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया।
इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूं का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया।

तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।

तीसरा अध्याय

( shri satyanarayan bhagwan ki vrat katha in hindi – chapter 3 )

श्री सूतजी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था।

कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था।

उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहां आया।

भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा।
साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूं।

राजा बोले – हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूं।

राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा – राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूंगा।

मुझे भी संतति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही संतति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से संतति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा – ‘जब मुझे संतति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा।

एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई।

दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रम की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं?

साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भांति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी।

तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया।

उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया।
उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये।

कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और पअने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा।

उसके बाद वे दोों राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ – यह शाप दे दिया।

एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहां आ गये जहां वह साधु वणिक था।

वहां राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बांधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’।

राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बांधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया।

भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी।

कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा।

उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी।
माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री ! रात में तू कहां रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा – मां! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है।

कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें।

वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायं।’ इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।’

राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा – ‘दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’ राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं।

इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके।
राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया।

राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को संतुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया।

पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा – ‘साधो! अब आप अपने घर को जायं।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ – ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

चौथा अध्याय

( shri satyanarayan bhagwan ki vrat katha in hindi – chapter 4)

श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा – ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये।

दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा।

सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं।

अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया।

दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा।

साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों।

मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये।

भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की।

भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत कोअपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा।

उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’

दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’

माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया।

इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये।

तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी।

कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं।

अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये।

भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं।

कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’

कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।

पांचवा अध्याय

( shri satyanarayan bhagwan ki vrat katha in hindi – chapter 5 )

श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था।

उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बाद वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं।

राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया।

पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ।

उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है।

इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की।

भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ।

श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है।

दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है – यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं।

इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है।

हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे।

अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे।

हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें।

महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।

लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया।

इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे सेचीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया।

महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए।

जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया।

इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पांचवां अध्याय पूर्ण हुआ।


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sanidev chalisa

Shani chalisa – श्री शनि देव चालीसा ( जयति जयति शनिदेव दयाला – Jayati Jayati Shanidev Dayala )

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shanidev chalisa lyrics

|| दोहा ||

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ।। 

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।  करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।।

॥ चौपाई ॥ ( Shani chalisa )

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला।। 

चारि भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै।। 

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।। 

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके।।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा।।

पिंगल, कृष्णों, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन।।

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा।।

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ।।

पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत।।

राज मिलत बन रामहिं दीन्ह्यो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्ह्यो।।

बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई।।

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा।।

रावण की गतिमति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई।।

दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका।।

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा।।

हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवाय तोरी।।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो।।

विनय राग दीपक महं कीन्ह्यो। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्ह्यो।।

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी ।।

तैसे नल पर दशा सिरानी । भूंजीमीन कूद गई पानी ।।

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई । पारवती को सती कराई ।।

तनिक विलोकत ही करि रीसा । नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ।।

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रौपदी होति उघारी ।।

कौरव के भी गति मति मारयो । युद्ध महाभारत करि डारयो ।।

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला ।।

शेष देवलखि विनती लाई । रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ।।

वाहन प्रभु के सात सजाना । जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ।।

जम्बुक सिंह आदि नख धारी । सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ।।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पति उपजावैं ।।

गर्दभ हानि करै बहु काजा । सिंह सिद्धकर राज समाजा ।।

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्राण संहारै ।।

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी ।।

तैसहि चारि चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ।।

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ।।

समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी ।।

जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ।।

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ।।

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ।।

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । दीप दान दै बहु सुख पावत ।।

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ।।

।। दोहा ।।

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार ।।

करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ।।


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108 Ayyappa saranam

108 Ayyappa saranam – The 108 Sarana Ghosham of Lord Ayyappa

108 Ayyappa saranam – Lord Ayyappa is Harihara Sutha because he represents both creation and destruction, and he assists his devotee in destroying all low bad tendencies and maintaining the seeker’s pure Sattvic essence.

By preserving the concept of Godliness and destroying all other thoughts connected to worldly infatuations, Lord Ayyappa protects our spiritual wealth and power.

When devotees worship Lord Ayyappa and climb Sabarimala, the 108 Sarana Ghosham ( 108 Ayyappa saranam ) is generally performed in chorus. It’s an amazing sensation to hear these repeated with dedication by hundreds of Devotees all at once.

The devotee strives to keep one thought on the Lord during the journey to the shrine. The Truth reveals itself to the seeker when single-pointed focus and meditation are maintained, as depicted by the Lord’s Darshan in the temple.

108 Ayyappa saranam

  1. Swamiye Saranam Ayyappa
  2. Harihara Suthane Saranam Ayyappa
  3. Kannimoola Mahaa Ganapathy Bhagavaane Saranam Ayyappa
  4. Shakti Vadivelan Sodarane Saranam Ayyappa
  5. Maalikaippurattu Manjamma Devi Lokamathave Saranam Ayyappa
  6. Vaavar Swamiye Saranam Ayyappa
  7. Karuppanna Swamiye Saranam Ayyappa
  8. Periya Kadutta Swamiye Saranam Ayyappa
  9. Cheriya Kadutta Swamiye Saranam Ayyappa
  10. Vana devathamaare Saranam Ayyappa
  11. Durga Bhagavathi maare Saranam Ayyappa
  12. Achchan Kovil Arase /Achchan Kovil Rajave Saranam Ayyappa
  13. Anaadha Rakshagane Saranam Ayyappa
  14. Annadhaana Prabhuve Saranam Ayyappa
  15. Achcham Thavirpavane Saranam Ayyappa
  16. Ambalathu Aasane Saranam Ayyappa
  17. Abhaya Dayakane Saranam Ayyappa
  18. Ahandai Azhippavane Saranam Ayyappa
  19. AshtaSiddhi Dayagane Saranam Ayyappa
  20. Andmorai Aadarikkum Deivame Saranam Ayyappa
  21. Azhuthayil Vaasane Saranam Ayyappa
  22. Aaryankaavu Ayyaave Saranam Ayyappa
  23. Aapath Baandhavane Saranam Ayyappa
  24. Ananda Jyotiye Saranam Ayyappa
  25. Aatma Swaroopiye Saranam Ayyappa
  26. Aanaimukhan Thambiye Saranam Ayyappa
  27. lrumudi Priyane Saranam Ayyappa
  28. lnalai Therppavane Saranam Ayyappa
  29. Heha para suka daayakane Saranam Ayyappa
  30. Irudaya kamala vaasane Saranam Ayyappa
  31. Eedillaa inbam alippavane Saranam Ayyappa
  32. Umaiyaval baalakane Saranam Ayyappa
  33. Umaikku arul purindavane Saranam Ayyappa
  34. Uzhvinai akatruvone Saranam Ayyappa
  35. Ukkam alippavane Saranam Ayyappa
  36. Engum niraindhone Saranam Ayyappa
  37. Enillaa roopane Saranam Ayyappa
  38. En kula deivame Saranam Ayyappa
  39. En guru naathane Saranam Ayyappa
  40. Erumeli vaazhum kiraata -Shasthave Saranam Ayyappa
  41. Engum nirainda naada brahmame Saranam Ayyappa
  42. Ellorkkum arul puribavane Saranam Ayyappa
  43. Aetrumaanoorappan magane Saranam Ayyappa
  44. Aekaanta vaasiye Saranam Ayyappa
  45. Aezhaikkarul puriyum eesane Saranam Ayyappa
  46. Aindumalai vaasane Saranam Ayyappa
  47. Aiyyangal teerppavane Saranam Ayyappa
  48. Opillaa maanikkame Saranam Ayyappa
  49. Omkaara parabrahmame Saranam Ayyappa
  50. Kaliyuga varadane Saranam Ayyappa
  51. Kan.kanda deivame Saranam Ayyappa
  52. Kambankudiku udaiya naathane Saranam Ayyappa
  53. Karunaa samudrame Saranam Ayyappa
  54. Karpoora jyotiye Saranam Ayyappa
  55. Sabari giri vaasane Saranam Ayyappa
  56. Shathru samhaara moortiye Saranam Ayyappa
  57. Sharanaagadha rakshakane Saranam Ayyappa
  58. Sharana ghosha priyane Saranam Ayyappa
  59. Shabarikku arul purindavane Saranam Ayyappa
  60. Shambhukumaarane Saranam Ayyappa
  61. Satya swaroopane Saranam Ayyappa
  62. Sankatam therppavane Saranam Ayyappa
  63. Sanchalam azhippavane Saranam Ayyappa
  64. Shanmukha sodarane Saranam Ayyappa
  65. Dhanvantari moortiye Saranam Ayyappa
  66. Nambmorai kaakkum deivame Saranam Ayyappa
  67. Narttana priyane Saranam Ayyappa
  68. Pantala raajakumaarane Saranam Ayyappa
  69. Pambai baalakane Saranam Ayyappa
  70. Parasuraama poojithane Saranam Ayyappa
  71. Bhakta jana rakshakane Saranam Ayyappa
  72. Bhakta vatsalane Saranam Ayyappa
  73. Paramashivan puthirane Saranam Ayyappa
  74. Pambaa vaasane Saranam Ayyappa
  75. Parama dhayaalane Saranam Ayyappa
  76. Manikanda porule Saranam Ayyappa
  77. Makara jyotiye Saranam Ayyappa
  78. Vaikkathu appan makane Saranam Ayyappa
  79. Kaanaka vaasane Saranam Ayyappa
  80. Kulattu puzhai baalakane Saranam Ayyappa
  81. Guruvaayoorappan makane Saranam Ayyappa
  82. Kaivalya padha daayakane Saranam Ayyappa
  83. Jaati mata bhedam illathavane Saranam Ayyappa
  84. Shivashakti Aikya svaroopane Saranam Ayyappa
  85. Sevipparku aananda moorthiye Saranam Ayyappa
  86. Dushtar bhayam neekkuvone Saranam Ayyappa
  87. Devaadi devane Saranam Ayyappa
  88. Devarkal thuyaram therthavane Saranam Ayyappa
  89. Devendra poojitane Saranam Ayyappa
  90. Narayanan mynthane Saranam Ayyappa
  91. Neiabhisheka priyane Saranam Ayyappa
  92. Pranava swaroopane Saranam Ayyappa
  93. Paapa samhaara moorthiye Saranam Ayyappa
  94. Paayasanna priyane Saranam Ayyappa
  95. Vanpuli vaakanane Saranam Ayyappa
  96. Varapradaayakane Saranam Ayyappa
  97. Bhaagavatottamane Saranam Ayyappa
  98. Ponambala vaasane Saranam Ayyappa
  99. Mohini sudhane Saranam Ayyappa
  100. Mohana roopane Saranam Ayyappa
  101. Villan vilaali veerane Saranam Ayyappa
  102. Veeramani kantane Saranam Ayyappa
  103. Sadguru nathane Saranam Ayyappa
  104. Sarva rokanivarakane Saranam Ayyappa
  105. Sachi ananda sorupiye Saranam Ayyappa
  106. Sarvaabheestha thayakane Saranam Ayyappa
  107. Saasvatapadam alippavane Saranam Ayyappa
  108. Patinettaam padikkutaiyanaadhane Saranam Ayyappa

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Satyanarayan Bhagwan ki Aarti - सत्यनारायण भगवान जी की आरती ( satyanarayan aarti lyrics in hindi )

Satyanarayan Bhagwan ki Aarti – सत्यनारायण भगवान जी की आरती ( satyanarayan aarti lyrics in hindi )

Satyanarayan Bhagwan ki Aarti – Friends, please find Shri satyanarayan aarti lyrics in hindi , satyanarayan aarti lyrics in english and Shri Ramchandra aarti lyrics !

Satyanarayan Bhagwan ki Aarti – satyanarayan aarti lyrics in hindi

ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा |
सत्यनारायण स्वामी ,जन पातक हरणा || जय लक्ष्मीरमणा

रत्नजडित सिंहासन , अद्भुत छवि राजें |
नारद करत निरतंर घंटा ध्वनी बाजें ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी….

प्रकट भयें कलिकारण ,द्विज को दरस दियो |
बूढों ब्राम्हण बनके ,कंचन महल कियों ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..

दुर्बल भील कठार, जिन पर कृपा करी |
च्रंदचूड एक राजा तिनकी विपत्ति हरी ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..

वैश्य मनोरथ पायों ,श्रद्धा तज दिन्ही |
सो फल भोग्यों प्रभूजी , फेर स्तुति किन्ही ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..

भाव भक्ति के कारन .छिन छिन रुप धरें |
श्रद्धा धारण किन्ही ,तिनके काज सरें ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..

ग्वाल बाल संग राजा ,वन में भक्ति करि |
मनवांचित फल दिन्हो ,दीन दयालु हरि ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..

चढत प्रसाद सवायों ,दली फल मेवा |
धूप दीप तुलसी से राजी सत्य देवा ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..

सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे |
ऋद्धि सिद्धी सुख संपत्ति सहज रुप पावे ॥
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी…..

ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा|
सत्यनारायण स्वामी ,जन पातक हरणा ॥ जय लक्ष्मीरमणा


Satyanarayan Bhagwan ki Aarti – satyanarayan aarti lyrics in english

Om Jai Lakshmi Ramana, Swami Jai Lashmi Ramana |
Satyanarayan Swami, Satyanarayan Swami, Jan Patak Harana || Jai Lakshmi Ramana

Ratan Ja Rat Singhasan, Adhbut Chabee Rajey, Swami Adhbut Chabee Rajey |
Narad Kahat Niranjan, Narad Kahat Niranjan, Ghanta dhun bhajey ||
Jai Lakshmi Ramana

Pragat Bhaye Kali Karan, Dwij Ko Daras Diya Swami Dwij Ko Daras Diya |
Budha Brahman Bankey, Budha Brahman Bankey, Kanchan Mahal Kiya ||
Jai Lakshmi Ramana

Durbal Bhil Kathier, Jan Par Kripa Karey Swami Jan Par Kripa Karey |
Chandra Choor Ik Raja, Chandra Choor Ik Raja, Jinaki Vipat Hare ||
Jai Lakshmi Ramana

Vaishya Manorath Payo, Shradha Uj Dini Swami Shradha Uj Dini |
So Fal Bhogyo Prabhuji, So Fal Bhogyo Prabhuji, Fer Ustati Kini ||
Jai Lakshmi Ramana

Bhav Bhakti Ke Karan, Chhin Chhin Roop Dharya Swami Chhin Chhin Roop Dharya |
Sharda Dharan Kini, Sharda Dharan Kini, Tin Ka Karj Sarya ||
Jai Lakshmi Ramana

Gwal Bal Sang Raja, Ban Mein Bhagti Karey Swami Ban Mein Bhagti Karey |
Man Vanchit Fal Dino, Man Vanchit Fal Dino, Deen Dayal Harey ||
Jai Lakshmi Ramana

Charhat Prasad Sawayo, Kadali Fal Mewa Swami Kadali Fal Mewa |
Doop Deep Tulsi Se, Doop Deep Tulsi Se, Raje Sat Deva||
Jai Lakshmi Ramana

Shri Satya Narayan Ji Ki Aarti jo koi gaa~vey Swami jo koi gaa~vey |
Kahat Shivanand Swami, Kahat Shivanand Swami Man Vanchhit Fal Pave ||
Jai Lakshmi Ramana

Om Jai Lakshmi Ramana, Swami Jai Lashmi Ramana |
Satyanarayan Swami, Satyanarayan Swami, Jan Patak Harana || Jai Lakshmi Ramana


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shri ramchandra ji ki aarti – shri ram chandra aarti lyrics in hindi

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

पहली आरती पुष्‍प की माला

पहली आरती पुष्‍प की माला

पुष्‍प की माला हरिहर पुष्‍प की माला

कालिय नाग नाथ लाये कृष्‍ण गोपाला हो।

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

दूसरी आरती देवकी नन्‍दन

दूसरी आरती देवकी नन्‍दन

देवकी नन्‍दन हरिहर देवकी नन्‍दन

भक्‍त उबारे असुर निकन्‍दन हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

तीसरी आरती त्रिभुवन मोहे  

तीसरी आरती त्रिभुवन मोहे

त्रिभुवन मोहे हरिहर त्रिभुवन मोहे हो

गरुण सिंहासन राजा रामचन्‍द्र शोभै हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

चौथी आरती चहुँ युग पूजा

चौथी आरती चहुँ युग पूजा

चहुँ युग पूजा हरिहर चहुँ युग पूजा

चहुँ ओरा राम नाम अउरु न दूजा हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

पंचम आरती रामजी के भावै

पंचम आरती रामजी के भावै

रामजी के भावै हरिहर रामजी के भावै

रामनाम गावै परमपद पावौ हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

षष्‍ठम आरती लक्ष्‍मण भ्राता

षष्‍ठम आरती लक्ष्‍मण भ्राता

लक्ष्‍मण भ्राता हरिहर लक्ष्‍मण भ्राता

आरती उतारे कौशिल्‍या माता हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

सप्‍तम आरती ऐसो तैसो

सप्‍तम आरती ऐसो तैसो

ऐसो तैसो हरिहर ऐसो तैसो

ध्रुव प्रहलाद विभीषण जैसो हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

अष्‍टम आरती लंका सिधारे

अष्‍टम आरती लंका सिधारे

लंका सिधारे हरिहर लंका सिधारे

रावन मारे विभीषण तारे हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

नवम आरती वामन देवा

नवम आरती वामन देवा

वामन देवा हरिहर वामन देवा

बलि के द्वारे करें हरि सेवा हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

कंचन थाल कपूर की बाती

कंचन थाल कपूर की बाती

कपूर की बाती हरिहर कपूर की बाती

जगमग ज्‍योति जले सारी राती हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

तुलसी के पात्र कण्‍ठ मन हीरा

तुलसी के पात्र कण्‍ठ मन हीरा

कण्‍ठ मन हीरा हरिहर कण्‍ठ मन हीरा

हुलसि हुलसि गये दास कबीरा हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।

जो राजा रामजी के आरती गावै

जो राजा रामजी के आरती गावै

आरती गावै हरिहर आरती गावै

बैठ बैकुण्‍ठ परम पद पावै हो

आरती कीजै राजा रामचन्‍द्र जी के

हरिहर भक्ति का रघु संतन सुख दीजै हो।


Ma durga aarti

Durga Aarti – Jai Ambe Gauri – मां दुर्गा जी की आरती

Shri Durga Aarti : For all the devotees for Ma Durga, friends find below Ma Durga Aarti – Jai Ambe Gauri.  

Ma Durga, the reincarnation of ‘Shakti’. Also known by many other names like – Ma Parvati, Ma Ambe. Every year 2 times during navaratri, Ma Durga’s 9 different forms are worshipped. For all the devotees of Ma Durga, please find below Shri Durga Aarti both in Hindi and English Script.

Jai Ambe Gauri – Maa Durga ji ki Aarti

Shri Durga Aarti - Jai Ambe Gauri - मां दुर्गा जी की आरती

Please find Lyrics of Ma Durga Aarti – Om Jai Ambe Gauri in Hindi and English

जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री ॥टेक॥
Jai ambe gauri, mayya jai shyama gauri
Tumko nish-din dhyavat, hari brahma shivji
Jai ambe gauri
मांग सिंदूर बिराजत टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना चंद्रबदन नीको ॥जय अम्बे गौरी॥
Maang sindoor virajat, tiko mrig-mad ko
Ujjwal se dou naina, chandra vadan niko ॥ Jai ambe gauri ॥
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै
॥जय अम्बे गौरी॥
Kanak samaan kalewar, raktaambar raaje
Rakt pushp gal-mala, kanthan par saaje ॥ Jai ambe gauri ॥
केहरि वाहन राजत खड्ग खप्परधारी ।
सुर-नर मुनिजन सेवत तिनके दुःखहारी ॥जय अम्बे गौरी॥
Kehri vahan rajat, kharag khapar dhaari
Sur nar muni jan sevat, tinke dukh haari ॥ Jai ambe gauri ॥
कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर राजत समज्योति ॥जय अम्बे गौरी॥
Kanan kundal shobhit, naas-agre moti
Kotik chandra divakar, sum rajat jyoti ॥ Jai ambe gauri ॥
शुम्भ निशुम्भ बिडारे महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती ॥जय अम्बे गौरी॥
Shumbh ni-shumbh vidare, mahisha sur ghati
Dhumra-vilochan naina, nish-din- mad mati ॥ Jai ambe gauri ॥
चण्ड मुंड संघारे शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दाऊ मारे, सुर भयहीन करे।
॥जय अम्बे गौरी॥
Chandh mundh sangh-haare, shonit beej hare
Madhu kaitabh dou maare, sur bhe heen kare ॥ Jai ambe gauri ॥
भ्राम्हणी रुद्राणी तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी , तुम शिव पटरानी।
॥जय अम्बे गौरी॥
Brahmani rudrani, tum kamla rani
Aagam nigam bakhani, tum shiv patrani ॥ Jai ambe gauri ॥
चौंसठ योगिनि मंगल गावैं नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू ॥जय अम्बे गौरी॥
Chon-sath yogini gavat, nritya karat bhairon
Baajat taal mridanga, aur baajat damaroomaroo ॥ Jai ambe gauri ॥
तुम ही जग की माता , तुम ही हो भरता।
भक्तों की दुःख हारता , सुख संपत्ति करता
॥जय अम्बे गौरी॥
Tum hi jag ki maata, tum hi ho bharta
Bhakto ki dukh harata, sukh sampati karata ॥ Jai ambe gauri ॥
भुजा चार अति शोभित खड्ग खप्परधारी।
मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी ॥जय अम्बे गौरी॥
Bhuja chaar ati shobit, var mudra dhaari
Man vaanchit phal pavat, sevat nar naari ॥ Jai ambe gauri ॥
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती ।
श्री मालकेतु में राजत कोटि रतन ज्योति ॥जय अम्बे गौरी॥
Kanchan thaal virajat, agar kapoor baati
Shri maal-ketu me rajat, kotik ratan jyoti
॥ Jai ambe gauri ॥
श्री अम्बे माँ की आरती जो कोई नर गावै ।
कहत शिवानंद स्वामी सुख-सम्पत्ति पावै ॥जय अम्बे गौरी॥
Shri ambe-ma-ki aaarti, jo koi nar gaave
Kahat shivanand swami, sukh sampati pave ॥ Jai ambe gauri ॥

Anuradha Paudwal Jai Ambe Gauri – on youtube


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Ganesh Stuti Mantra

Ganesh Stuti Mantra – Shlokam, Dhyan Mantra and Mool Paath

Ganesh Stuti Mantra – Lord Ganesha is the first worshipped. Worship of Lord Ganesha on Wednesday has special significance. Lord Ganesha is worshiped before every auspicious work.

Lord Ganesha is known by many names. Gajanan, Vighnaharta, Ganapati, Lambodar and many more are the names of Lord Ganesha.

Lord Ganesha is said to be the destroyer of obstacles and the bestower of wisdom and fame.

While worshiping Lord Ganesha, one should definitely recite the aarti and Chalisa of Lord Ganesha.

If the Lord Ganesha Stuti Mantra is read while worshiping, then the Lord is very pleased.

The description of Sankatnashan Ganesh Stotra is found in Narada Purana. It is believed that by reciting this stotra, all the troubles coming in the life of a person are removed.

According to a belief, when the people of the world came to know about Lord Ganesha, the son of Shiva, they worshipped Ganesha with full devotion.

After this Ganesh ji was very pleased. Pleased, he provided the desired result to everyone.

It is believed that whoever does Shri Ganesh strotam regularly, his financial problems go away.

So if you are looking for Shri Ganesh stuti lyrics, read further !

Ganesh stuti – श्लोक

ॐ गजाननं भूंतागणाधि सेवितम्, कपित्थजम्बू फलचारु भक्षणम् |
उमासुतम् शोक विनाश कारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ||

Ganesh stuti Mantra | गणेश स्तुति ध्यान मंत्र

ओम सिन्दूर-वर्णं द्वि-भुजं गणेशं लम्बोदरं पद्म-दले निविष्टम्।

ब्रह्मादि-देवैः परि-सेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणामि देवम्।।

Ganesh stuti Mool Path | गणेश स्तुति मूल-पाठ

सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजित: फल-सिद्धए।

सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे।।

त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चित:।

सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे।।

भगवान गणेश की वंदना आरती

हिरण्य-कश्यप्वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चित:।

सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे।।

महिषस्य वधे देव्या गण-नाथ: प्रपुजित:।

सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे।।

Ganesh stuti in hindi

Ganesh stuti lyrics in hindi – ऐसे करें भगवान गणेश जी की स्तुति

गाइये गणपति जगवंदन |
शंकर सुवन भवानी के नंदन ॥

सिद्धी सदन गजवदन विनायक |
कृपा सिंधु सुंदर सब लायक़ ॥

मोदक प्रिय मृद मंगल दाता |
विद्या बारिधि बुद्धि विधाता ॥

मांगत तुलसीदास कर ज़ोरे |
बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥


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Argala stotram

Argala stotram ( अथार्गलास्तोत्रम् ) – Argala stotram lyrics in hindi

Argala stotram ( अथार्गलास्तोत्रम् ) – श्री दुर्गा सप्तशती में देवी कवच के बाद अर्गला स्तोत्र पढ़ने का विधान है। इस पोस्ट में हम Argala stotram lyrics in hindi पढ़ेंगे ।

अर्गला कहते हैं अग्रणी या अगड़ी।

Argala stotram (अर्गला स्तोत्र ) का पाठ दुर्गा कवच के बाद और  कीलक स्रोत के पहले किया जाता है। यह देवी माहात्म्य के अंतर्गत किया जाने वाला स्तोत्र सारी बाधाओं को दूर करने वाला।

किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए आवश्यक है ।

इस स्तोत्र का पाठ नवरातत्रि के अलावा देवी पूजन या सप्तशती पाठ के साथ भी किया जाता है। अर्गला स्तोत्र अमोघ है। रूप, जय, यश देने वाला। नवरात्रि में इसको पढ़ने का विशेष विधान और महत्व है।



कैसे करें अर्गला स्तोत्र – How to do Argala stotram

1. सरसो या तिल के तेल का दीपक जलाएं

2. चामुण्डा देवी माँ का ध्यान करें।

3. देवी भगवती के अर्गला स्तोत्र का संकल्प लें और अपनी इच्छा देवी के समक्ष व्यक्त करें

4. अर्गला स्तोत्र में मंत्र शक्ति का प्रयोग करें

5. अर्गला स्तोत्र का यथा संभव तीन बार या सात बार पाठ करें

6. कुछ मंत्र ऐसे हैं, जिनका वाचन करते हुए आप यज्ञ भी कर सकते हैं।

7.काले तिल और शहद से यज्ञ की आहूति दे ।

8. अर्गला स्तोत्र का प्रात: काल या मध्य रात्रि पर पाठ करें।

सिद्ध मंत्र

रक्त बीज वधे देवि चण्ड मुण्ड विनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ( शत्रु दमन के लिए )

वन्दि ताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्य दायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ( सौभाग्य के लिए)

विनियोग- ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।

Argala stotram lyrics in hindi

ॐ नमश्चण्डिकायै

ऊं जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ।1)
जय त्वं देवी चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणी
जय सर्वगते देवी कालरात्रि नमोSस्तु ते। 2।

ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है। 
मार्कण्डेय जी कहते हैं – जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा – इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! तुम्हें नमस्कार हो।।

मधुकैटभविद्राविविधातृ वरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।३।।
महिषासुरनिर्णाशि भक्तनाम सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ४।।

मधु और कैटभ को मारने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली देवि! तुम्हे नमस्कार है। तुम मुझे रूप (आत्मस्वरूप का ज्ञान) दो, जय (मोह पर विजय) दो, यश (मोह-विजय और ज्ञान-प्राप्तिरूप यश) दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।। महिषासुर का नाश करने वाली तथा भक्तों को सुख देने वाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।३-४।।

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। ५ ।।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ६।।

रक्तबीज का वध और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।५-६।।

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनी।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ७।।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ८।।

सबके द्वारा वन्दित युगल चरणों वाली तथा सम्पूर्ण सौभग्य प्रदान करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं। तुम समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली हो। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।७-८।।

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ९।।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वाम चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ।। १०।।

पापों को दूर करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में सर्वदा (हमेशा) मस्तक झुकाते हैं, उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। रोगों का नाश करने वाली चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं, उन्हें तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।९-१०।।

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। ११।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १२।।

चण्डिके! इस संसार में जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं उन्हें रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मुझे सौभाग्य और आरोग्य (स्वास्थ्य) दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।११-१२।।

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १३।।
विधेहि देवि कल्याणम् विधेहि परमां श्रियम।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १४।।

जो मुहसे द्वेष करते हों, उनका नाश और मेरे बल की वृद्धि करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। देवि! मेरा कल्याण करो। मुझे उत्तम संपत्ति प्रदान करो। रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। १३-१४।।

सुरसुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १५।।
विद्यावन्तं यशवंतं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १६।।

अम्बिके! देवता और असुर दोनों ही अपने माथे के मुकुट की मणियों को तुम्हारे चरणों पर घिसते हैं तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। तुम अपने भक्तजन को विद्वान, यशस्वी, और लक्ष्मीवान बनाओ तथा रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१५-१६।।

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १७।।
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्र संस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १८।।

प्रचंड दैत्यों के दर्प का दलन करने वाली चण्डिके! मुझ शरणागत को रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। चतुर्भुज ब्रह्मा जी के द्वारा प्रशंसित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१७-१८।।

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वत भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। १९।।
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २०।।

देवि अम्बिके! भगवान् विष्णु नित्य-निरंतर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। हिमालय-कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा होने वाली परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।१९-२०।।

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २१।।
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २२।।

शचीपति इंद्र के द्वारा सद्भाव से पूजित होने वाल परमेश्वरि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। प्रचंड भुजदण्डों वाले दैत्यों का घमंड चूर करने वाली देवि! तुम रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।।२१-२२।।

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदये अम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।। २३।।
पत्नीं मनोरमां देहिमनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ।। २४।।

देवि! अम्बिके तुम अपने भक्तजनों को सदा असीम आनंद प्रदान करती हो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।। मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसार से तारने वाली तथा उत्तम कुल में जन्मी हो।।२३-२४।।

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशती संख्या वरमाप्नोति सम्पदाम्। ॐ ।। २५।।

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करके सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती की जप से मिलने वाले श्रेष्ठ फल और प्रचुर संपत्ति को प्राप्त करता है।

।। श्रीमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।


Vishnu Aarti - Om jai jagdish hare aarti

Vishnu Aarti – Om jai jagdish hare aarti

To all our readers, we bring for you Shri Vishnu Aarti – Om jai jagdish hare aarti. We all many a times need the lyrics.

In this post Shri Vishnu Aarti we bring you the lyrics. The font is in english, but the reading in in Hindi. That is it is written in english font but when you read it it is in hindi!

Jai Shri Hari , Jai Bhagwan Vishnu – Hare Rama – Hare Krishna !

Shri Hari, Shri Vishnu Aarti

Om jai jagdish harey, Swami jai jagdish harey

Bhagt jano ke sankat, chan mein door karey

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Jo Dhiyavay phal pavay dukh binase man ka Swami dukh binase man ka

Sukh Sampati ghar aavey kasht mitay tan ka

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Mat Pita tum mere, sharan pau mai kisaki Swami sharan pau kisaki

Tum bin aur na duja aash karoo jisaki

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Tum pooran parmatma tum antaryami Swami tum antaryami

Par Brahm parmeshwar tum sabke swami

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Tum karuna ke sagar tum palan karta Swami tum palan karta

Mai murakh kul kami kripa karo bharta

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Tum ho ek agochar sabh ke pranpati Swami sabh ke pranpati

Kisa bid milhu dayamay tumko mae kumati

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Din Bandu dukh harta tum thakur mere Swami tum thakur mere

Apne hath uthao, apnay charan lagao Dwar khada tere

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Vishay vikar mitao pap haro deva Swami pap haro deva

Shardha Bhakti Badao, Santan ki sewa

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||

Om jai jagdish harey, Swami jai jagdish harey

Bhagt jano ke sankat, shan mein door karey

Om jai jagdish harey , Swami jai jagdish harey ||


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Satyanarayan Aarti

Satyanarayan Aarti – Sri Satyanarayan ji ki aarti and Satyanarayan pooja vidhi ( In English font )

Dear readers in this article we bring to you Shri Satyanarayan Aarti – Sri Satyanarayan ji ki aarti and Satyanarayan pooja vidhi. The reading will be in Hindi, but the font is in english.

Hope this article Satyanarayan Aarti – Sri Satyanarayan ji ki aarti and Satyanarayan pooja vidhi is helpful to you.


Shri Satyanarayan pooja vidhi

Sri Satyanarayan Vrat karney wale

  1. Purnima, sankrant ya ekadasi ke din vrat karen
  2. Sham ko snan adi se nivrit hokar, puja sthaan mein aasan par baithen
  3. Shri Ganesh, Gauri, Varun, Vishnu adi Nav Devtaun ka dhyan karen aur pujan karey
  4. Phir sankalp karey ki mainShri Satyanarayan Swami ka pujan tatha shravan sadaiva karoonga.
  5. Pushp haathon mein lekar, Shri Satyanarayan Swami ka dhyan karey.
  6. Pushp, dhoop, deep, naivaidya adi se yukt hokar stuti karey.
  7. ‘Hey Bhagwan, mainey shrada poorvak phal, jal, adi sab samagri aapko arpan ki hai, isey sweekar keejiye.
  8. Aapdaon se meri raksha keejiye. Mera aapko baarambar namaskar hai.
  9. Iske baad Shri Satyanarayan ki katha padey athwa shravan karey. ( Neeche sri satyanarayan vrat katha ka link diya hai )

Please follow Shri Satyanarayan pooja vidhi as given above and for Katha please click on the link below:

Sri satyanarayan vrat katha

After Shri Satyanarayan pooja vidhi, you will find Sri Satyanarayan Aarti as below:

Satyanarayan Aarti

Please find below Sri Satyanarayan ji ki Aarti. As mentioned, the reading is in hindi, but the font is in english.

Sri Satyanarayan ji ki Aarti

Jai Lakshmi Ramana, Swami Jai Lashmi Ramana, Satyanarayan Swami, Jan Patak Harana, Jai Lakshmi Ramana ||

Ratan Ja Rat Singhasan, Adhbut Chabee Rajey Narad Kahat Niranjan, Ghanta dhun bhajey Jai Lakshmi Ramana ||

Praghat Bhaye Kali Karan, Dwaj Ko Daras Diya Budha Brahman Bankey, Kanchan Mahal Kiya Jai Lakshmi Ramana ||

Durbal Bhil Kathier, Jan Par Kripa Karey Chandra Choor Ik Raja, Jinaki Vipat Hare Jai Lakshmi Ramana ||

Vayesh Manorath Payo, Shradha Uj Dini So Fal Bhogyo Prabhji, Fer Ustati Kini Jai Lakshmi Ramana ||

Bhav Bhagti Ke Karan, Chhin Chhin Roop Dharya Sharda Dharan Kini, Tin Ka Karj Sarya Jai Lakshmi Ramana ||

Gwal Bal Sang Raja, Ban Mein Bhagti Karey Man Vanchit Fal Dino, Deen Dayal Harey Jai Lakshmi Ramana ||

Charhat Prasad Sawayo, Kadali Fal Mewa Doop Dheep Tulsi Se, Raje Sat Deva Jai Lakshmi Ramana ||

Shri Satya Narayan Ji Ki Aarti jo koi gaavey Kahat Shianand Swami Man Van Chit Fal Paavey Jai Lakshmi Ramana ||


Shri Satyanarayan Vrat Katha ( In English font )

Shri Satyanarayan Vrat Katha ( In English font )

We all know about, Shri Satyanarayan Vrat Katha, being one of the most popular katha in Hinduism.

One who observes Shri Satyanarayan Vrat Katha with full devotion and trust is likely to accomplish all his wishes.

According to our shastras, hearing the Satyanarayan Katha during the Kalyuga bears immense fruit.

Lord Vishnu in his appearance as Lord Satyanarayan is worshipped in this katha.

  • Satya denotes truth,
  • Nar denotes a man, and
  • Ayan denotes a location.

Satyanarayan is the name given to the spot in man where truth resides. The ‘Satyanarayan katha’ and ‘vrat’ assist us in overcoming vicissitudes.

Shri Satyanarayan Vrat Katha – Pratham Adhyaya

Ek Samay Nem Sharanya Tirth mein Saunik Adi Athaasi Hazaar Rishyo ne Shri Sutji se poocha –”Hey Prabhu, Is Kalyug mein Vaid-Vidya rahit manushyo ko prabhu Bhakti kis prakar milaygi tatha unka udhar kaisey hoga?

Isliye hey muni shreshta, koi aisa tap kahiye jis se thodey samay mein punya prapt ho tatha mano vanchit fal miley.”

Sarvashastra ghyata Shri Sutji boley, “Hey Vaishnavo mein pujya – aap sab ne sarva praniyo ke hit ki baat poochi hai.

Ab mein us shreshta vrat ko aap logo mein kahoonga, jis vrat ko Narad ji ne LakshmiNarayan se poocha tha aur Shri LakshmiPati ne Muni Shreshta Narad se kaha tha –so dhyan se suniye.

Ek samay, Yogiraj Narad ji doosro ke hit ki ichcha se, anek lokon mein ghoomtey huey mrityulok mein aa pahunchey.

Vahan bahut yoniyon mein janmey huey praya sabhi manushyon ko apne karmo ke dwara anek dukho se peedit dhek kar kis yatna ke karney se nischay hi inkey dukho ka nash ho sakega, aisa man mein sochkar Vishnulok ko gaye.

Vahan shwet varna aur char bhujaon wale devon ke eersh Narayan ko (jinkey haaton mein shanka, chakra, gada aur padma they, tatha vanmala pahney huey they) dekhkar stuti karney lagey.

“Hey Bhagwan, aap atyant shakti se samparn hai. Man tatha vani bhi aapko nahi pa sakti, aapka aadi, madhya aur ant nahin hai, nirgun swaroop shrishti ke aadi bhoot va bhakto ke dukho ko nasht karney wale hai.

Aapko mera namaskar hai.”

Naradji se is prakaar stuti sunkar Vishnu Bhagwan boley ki “Hey Munishreshta – Aapke man mein kya hai?

Aapka yahan kis kaam ke liye aagman hua hai? Nisankoj kaho.” Tab Naradmuni boley, “Mrityu lok mein sab manushya jo anek yoniyo mein paida huey hai, apne apne karmo ke dwara anek prakaar ke dukho se dukhi ho rahey hai.

Hey Nath muj par daya rakhtey hai to batlaeay ki un manushyo ke sab dukh thodey se hi prayatna se kaisey door ho saktey hai?” Shri Vishnu Bhagwanji boley ki “Hey Narad, Manushyo ki bhalai ke liye tumne yeh bahut achchi baat poochi.

Jis kaam ke karney se manushya moh se choot jaata hai, vah mein kehta hoo suno. Bahut punya ka deney wala, swarg tatha manushya lok dono mein durlab ek vrat hai. Aaj mein premvash hokar tumse kehta hoo.

Shri Satyanarayanji ka vrat achchi tarah vidhan purvak karke manushya turant hi yahan sukh bhogkar marne par moksh ko prapt hota hai.”

Shri Vishnu Bhagwan ke vachan sunkar Narad ji ne poocha ki us vrat ka kya fal hai, kya vidhan hai, aur kisne yeh vrat kiya hai aur kis din yeh vrat karna chahiye, kripa karke vistaar se bataiye.

Shri Vishnu Bhagwan boley, “Dukh shok aadi ko door karne wala, dhan dhanya ko badane wala, saubhagya tatha santaan ko dene wala, sab sthano par vijaye karne wala, Shri Satyanarayan Swami hai.

Bhakti aur shradha ke saat kisi bhi din, manushya Shri Satyanarayan ki sham ke samay, Brahmano aur bandhuo ke saath dharmaparayan hokar puja karey, bhakti bhav se savaya prasad de.

Gehu ke abhaav mein saathi ka churan, shakar tatha gud le aur sabh bhakshan yogya padarath jama karke savaye arpan kar devey tatha bandhuo sahit bhojan karavey.

Bhakti ke saath swayam bhojan karey.

Nritya aadi ka aachran kar Shri Satyanarayan Bhagwan ka smaran kar samast samai vyateet karey.

Is tarah ka vrat karney par manushyo ki ichcha nischay hi poori hoti hai. Vishesh kar kal kaal mein bhoomi par yahi moksh ka saral upaya hai.

Shri Satyanarayan Vrat Katha – Dvitiya Adhyaya ( Scond Chapter )

Sutji boley “Hey Rishyo! Jisne pehle samay mein is vrat ko kiya hai uska itihaas kehta hoo, dhyan se suno.”

Sunder Kashipuri nagari mein ek ati nirdhan Brahman rehta tha. Vah bookh aur pyaas se bechain hua nitya hi prithvi par ghumta tha.

Brahmano ko prem karne wale Bhagwan ne Brahman ko dukhi dekhkar, boodey Brahman ka roop dhar uske paas jaakar aadar ke saath poocha,

“Hey Vipra! Tu nitya dukhi hua prithvi par kyo ghumta hai? Hey shreshta Brahman! Yeh sab mujse kaho, mein sunana chahata hoo.” Brahman bola “Mein nirdhan Brahman hoo, biksha ke liye prithvi par firta hoo.

Hey Bhagwan, yadi aap iska upaya jaante ho to kripa karke batao.” Vridh Brahman bola ki Satyanarayan Bhagwan manovanchit fal ko dene wala hai.

Isliye hey Brahman tu unka pujan kar, jiske karne se manushya sab dukho se mukt hota hai. Brahman ko vrat ka vidhan batakar budey Brahman ka roop dharan karne wale Satyanarayan Bhagwan antardhyan ho gaye.

Jis vrat ko vridh Brahman ne batlaya hai, mein usko karoonga. Yeh nischay karne par usey raat mein neend bhi nahi aayi. Vah saverey utha.

Shri Satyanarayan ke vrat ke nischay kar biksha ke liye chala. Us din usko biksha mein bahut sa dhan mila jis se bandhu-baandhavo ke saath usne Shri Satyanarayan ka vrat kiya.

Iske karne se vah brahman dukho se chutkar anek prakaar ki sampatiyo se yukt hua. Us samay se vah Brahman har maas vrat karne laga.

Is tarah Satyanarayan Bhagwan ke is vrat ko jo karega vah sab papo se chutkar mauksh ko prapt hoga.

Aagey jo prithvi par Satyanarayan vrat karega, vah manushya sab dukho se chut jayega. Is tarah Naradji ne Shri Narayan ka kaha hua yeh vrat tumse kaha. Hey Vipro! Mein ab aur kya kahu?

Rishi boley “Hey Munishwaro! Sansar mein is Brahman se sunkar kis kis ne is vrat ko kiya, hum vah sab sunana chahatey hain.

Iske liye humarey man mein shradha hai. Sutji boley “Hey Muniyo! Jis Jisne us vrat ko kiya hai vah sab suno.

Ek samay vah Brahman, dhan aur aishwarya ke anusaar bandhu-baandhavo ke saath vrat karne ko tayar hua.

Usi samay ek lakdi bechney wala ek buda aaya aur bahar lakadiyo ko rakhkar Brahman ke makan mein gaya.

Pyaas se dukhi lakadharey ne Brahman ko vrat kartey dekhkar namaskar karkey poochney laga ki aap yeh kya kar rahey hai aur iskey karney se kya fal milta hai? Kripa karkey mujse kahiye.

Brahman ne kaha, “Sab manokamnao ko poora karne wala, yeh Satyanarayan ka vrat hai. Iski hi kripa se mere yahan dhan-dhanya aadi ki vridhi hui hai.”

Brahman se is vrat ke barey mein jaankar lakadhara bahut prasan hua. Charnamrit lekar aur prasad khaney ke baad, apne ghar ko gaya.

Lakadharey ne man mein is prakaar ka sankalp kiya ki aaj gram mein lakdi bechney se jo dhan mujhe milega usi se Shri Satyanarayan Bhagwan ka uttam mein vrat karoonga.

Yeh man mein vichar kar, budha lakadhara lakadiya sar par rakhkar Sundernagar mein gaya. Us roz vahan par usey un lakadiyo ka daam pehle dino se chauguna mila.

Tab budha lakadhara daam lekar aur ati prasan hokar pakkey kele ki fali, shakar, ghee aur dahi, gehu ka chun ityadi Satyanarayan Bhagwan ki vrat ki kul samagriyo ko lekar apne ghar gaya.

Phir usne apne sab bhaiyo ko bulakar vidhi ke saath Bhagwan ji ka pujan aur vrat kiya.

Us vrat ke prabhav se budha lakadhara dhan, putra, aadi se yukt hua aur sansar ke samast sukh bhogkar vaikunth ko chala gaya.

Shri Satyanarayan Vrat Katha – Tritya Adhyaya ( third Chapter )

Sutji bole, “Hey shresta muniyo! Ab aagey ki katha kehta hoo- suno. Pehle samay mein Ulkamukh naam ka ek budhimaan raja tha.

Vah satyavakta aur jeetendra tha. Pratidin dev sthano mein jaata tatha garibo ko dhan dekar unkey kasht door karta tha.

Uski patni kamal ke samaan mukh wali aur sati sadhvi thi. Badrashila nadi ke tath par un dono ne Satyanarayan Bhagwan ka vrat kiya.

Usi samay mein vahan ek sadhu vaishya aaya. uske paas vyapaar ke liye bahut sa dhan tha.

Nav ko kinarey par thehra kar raja ke paas gaya aur raja ko vrat kartey huey dekh kar vinay ke saath poochney laga–Hey rajan! Bhaktiyukt chit se aap kya kar rahey hai? Meri bhi sunaney ki ichcha hai.

Yeh aap mujhe bataea.

Raja bola “Hey Sadhu! Apne baandhavo ke saath putradi ke prapti ke liye Mahashaktivaan Satyanarayan Bhagwan ka vrat va pujan kiya ja raha hai.

Raja ke vachan sunkar Sadhu aadar ke saath bola, “Hey rajan! Mujko iska sabh vidhan kahiye, mein bhi aapke katha anusar is vrat ko karoonga.

Meri bhi koi santaan nahi hai aur is se nischay hi hogi. Raja se sabh vidhan sunkar, vyapaar se nivrit hokar, aanand ke saath ghar gaya.

Sadhu ne apni stri se santaan dene wale us vrat ka samachar sunaya aur kaha ki jab meri santaan hogi tab mein is vrat ko karoonga.

Sadhu ne aise vachan apni stri Lilawanti ko kahey. Kuch samay baad, Lilawanti garbawati hui tatha dasve mahiney mein uske ek sunder kanya ka janam hua jiska naam Kalawanti rakha gaya.

Tab Lilawanti ne meethe shabdo mein apne pati se kaha ki aapne jo sankalp kiya hua tha ki Bhagwan ka vrat karoonga, ab aap usey kariye. Sadhu bole, Hey priya! Iske vivah par karoonga.

Apni patni ko aashvaasan dekar voh nagar ko gaya. Kalawanti pitragrah mein vridhi ko prapt ho gayi.

Sadhu ne jab nagar mein sakhiyo ke saath apni putri ko dekha to turant hi doot ko bulakar kaha ki putri ke vastey koi suyogya var dekh kar laao. Sadhu ki aagya paakar doot Kanchan

Nagar pahuncha aur vahan par badi khoj kar aur dekhbhaal kar ladki ke vaastey suyogya vanik putra ko le aaya.

Us suyogya ladke ko dekh kar, Sadhu ne apne bhai-bandhuo sahit prasan-chit apni putri ka vivah uske saath kar diya. Kintu, durbhagya se vivah ke samay bhi us vrat ko karna bhool gaya.

Tab Shri Bhagwan krodhit ho gaye aur usey shrap diya ki voh daarun dukh prapt hoga.

Apne kaam mein kushal sadhu baniya apne jaamata sahit samudra ke samip Ratanpur nagar pahuncha.

Aur vahan dono sasur jamai, Chandraketu Raja ke nagar mein pahunche aur vyapaar karney lagey.

Ek roz, Bhagwan Satyanarayan ki maya se prerit koi chor raja ka dhan churakar sheegra ja raha tha kintu peechey se raja ke dooton ko aatey dekh kar, chor ne ghabrakar bhaagtey-bhaagtey dhan ko vahin chup-chap rakh diya jahan vah dono sasur jamai thehrey huye they.

Doono ne us sadhu vaishya ke paas raja ke dhan ko rakha dekh kar dono ko baandhkar le gaye aur prasanta se daudtey huey raja ke samip jaakey boley, “Yeh do chor hum pakad kar laye hai, dekh kar agya de.”

Raja ki agya se unko kathin kaaravaas mein daal diya aur unka dhan raja ne cheen liya. Usi shrap dwara uski patni bhi ghar par bahut dukhi hui aur ghar par jo dhan rakha tha chor churakar le gaye.

Sharirik va mansik peeda mein bookh va pyaas se ati dukhit ho ann ki chinta mein, Kalawanti ek Brahman ke ghar gaye.

Vahan usne Satyanarayan vrat hotey dekha. Vahan usne katha suni aur prasad grahan kar raat ko ghar aayi.

Mata ne Kalawanti se kaha, “Hey putri! Din mein kahan rahi va tere man mein kya hai?”

Kalawanti boli, “Hey mata! maine ek Brahman ke ghar Satyanarayan ka vrat dekha.” Kanya ka vachan sunkar, Lilawanti Satyanarayan Bhagwan ke pujan ki tayari karney lagi.

Lilawanti ne parivar aur bandhuo sahit Bhagwan ka pujan kiya aur yeh var maanga ki mere pati aur daamaad sheegra hi aa jaavey aur prathna ki ki hum sab ka apraadh shama karo.

Satyanarayan Bhagwan is vrat se santusht ho gaye aur Raja Chandraketu ko swapna mein dekhayee diye aur kaha ki “Hey rajan! Dono bandhi vaishyon ko prat hi chod do aur unka sab dhan jo tumne grahan kiya hai de do nahi to tera dhan, rajya, putradi sab nasht kar doonga.”

Raja ko aisa vachan sunakar Bhagwan antardhyan ho gaya. Prat-Kaal Raja Chandraketu ne sabha mein apna swapna sunaya aur dono vanik putro ko kaid se mukt kar sabha mein bulaya.

Dono ne aatey hi Raja ko namaskar kiya. Raja meethey vachno se boley, “Hey Mahanubhavo!

Bhagyavash aisa katheen dukh prapt hua hai, ab koi bhay nahi hai.

” Aisa kahkar Raja ne unko naye-naye vastrabushan pehnaye tatha unka jitna dhan liya tha us se duna dhan dilvakar vida kiya. Dono vaishya apne ghar ko chal diye.

Shri Satyanarayan Vrat Katha – Chaturtha Adhyaya ( Fourth Chapter )

Sutji boley, “Vaishya ne mangalachar karke yatra aarambh ki aur apne nagar ko chala.

Unkey thodi door pahunchney par dandi veshdhari Satyanarayanji ne un se poocha, “Hey sadhu! teri naav mein kya hai?

Abhimani vaanik hasta hua bola, “Hey dandi, aap kyon poochtey ho? Kya dhan lene ki ichcha hai?

Meri naav mein to bel tatha pattey adi bharey hai. Vaishya ka kathor vachan sunkar, Bhagwan ne kaha ki tumhara vachan satya ho.

Aisa kahkar dandi vaha se chaley gaye aur kuch door jaakar samudra ke kinarey baith gaye.

Dandi ke jaaney par vaishya ne nitya kriya karne ke baad naav ko oonchi uthi dekh achamba kiya tatha naav mein bel patradi dekh murchit ho gir pada.

Phir murcha khulney par bahut shok karne laga. Tab uska daamaad bola ki aap shok na karey, yeh dandi ka shrap hai.

Aapko sharan mein chalna chahiye tabhi hamari manokamna poori hogi. Damad ke vachan sunkar vah dandi ke paas pahuncha.

Bhakti bhav se namaskar kar bola, “Maine jo aap se asatya vachan kahey they us ko shama karo, aisa kahkar vah mahan shokatur ho roney lagey.

Dandi Bhagwan boley, “Hey vanik putra! Meri aagya se tumhe baar-baar dukh prapt hua hai. Tu meri puja se vimukh hua hai.”

Sadhu bola, “Hey Bhagwan! Aapki maya se mohit gyani aapke roop ko nahi jaantey, tab mein agyani kaise jaan loo?

Aap prasan hoiay, mein saamarth ke anusaar aapki puja karoonga. Meri raksha karo aur pehle ke samaan, nauka mein dhan bhar do.” Un dono ke bhaktiyukt vachan sunkar Bhagwan prasan ho gaye.

Uski ichanusar var dekar antardhyan ho gaye. Tab unho ne naav par aakar dekha ki naav dhan se paripurn hai. Phir vah Bhagwan Satyanarayan ka pujan kar saathiyo sahit apne nagar ko chala. jab vah apne nagar ke nikat pahuncha tab doot ko ghar bheja.

Doot ne sadhu ke ghar jakar, uske stri ko namaskar karke kaha ki sadhu apne daamaad sahit is nagar ke samip aa gaye hai.

Aisa vachan sunkar Lilawanti ne bade harsh ke saath Bhagwan Satyanarayan ka pujan kar putri se kaha mein apne pati ke darshano ko jaati hoo, tu karya purna karke sheegra aana.

Mata ke vachan sunkar Kalawanti prasad chhodkar pati ke paas gaye. Prasad ki avagya ke karan Bhagwan Satyanarayan ne rusht hokar uske pati ko naav sahit pani mein duba diya. Kalawanti apne pati ko na dekhkar roti hui zameen par gir gayi.

Is tarah naav ko dooba hua tatha kanya ko rota dekh sadhu dukhit ho bola, “Hey Prabhu! Mujse ya mere parivar se jo bhool hui usey shama karo.

Uske deen vachan sunkar Bhagwan Satyanarayan prasan ho gaye aur aakashvani hui. “Hey Sadhu! Teri kanya mere prasad ko chhodkar aayi hai, isliye iska pati adrishya hua hai. Yadi woh ghar jaakar prasad khaakar lautey to isey pati avashya milega.

Aakashwani se aisa sunkar, Kalawanti ne ghar pahunchkar prasad khaaya. Phir us ne aakar pati ke darshan kiye, tab vaishya parivar ke sab log prasan huey.

Phir sadhu ne baandhavo sahit Bhagwan Satyanarayan ka vidhi poorvak pujan kiya. Us din se har purnima va sankrant ko Bhagwan Satyanarayan ka pujan karne laga.

Phir is lok ka sukh bhogkar swarg ko chala gaya.

Shri Satyanarayan Vrat Katha – Panham Adhyaya ( Fifth Chapter )

Sutji boley, “Hey Rishyo! Mein aur bhi katha kehta hoo, suno. Praja palan mein leen, Tungadhwaj naam ka raja tha. Usne bhi Bhagwan ka prasad tyag kar bahut dookh paaya.

Ek samay, vanmein ja karke pashuo ko maarkar bud ke ped ke neechey aaya. Us ne bhaktibhav se gwalo ko baandhavo sahit Bhagwan Satyanarayan ka pujan karte dekha.

Raja dekhkar bhi, abhimaan vash na vahan gaya, na namaskar kiya. Jab gwalo ne Bhagwan ka us ke saamne prasad rakha, to vah prasad ko tyag kar apni sunder nagri ko chala gaya.

Vahan us ne apna sab kuch nasht paaya. To vah samaj gaya ki yeh sabh kuch prasad ke niradhar ke vajai se hua hai.

Tab vah, vishwas kar gwalo ke samip gaya aur vidhi poorvak pujan kar prasad khaaya.

Bhagwan Satyanarayan ki kripa se sab jaisa tha vaisa hi ho gaya. Tatha sukh bhogkar marne par swarg lok mein gaya.

Jo manushya is param durlab vrat ko karega, Bhagwan ki kripa se usey dhan dhanya ki prapti hogi. Nirdhan dhani hota hai. Bandhi bandhan se mukt hokar nirbhay ho jaata hai.

Santaanheeno ko santaan prapt hoti hai. Sab manorath purna hokar ant mein vaikunth dham ko jaata hai.

Jinhonay, pehle is vrat ko kiya hai, uske doosrey janam ki katha kehta hoo. Vridh Shatanand Brahman ne Sudama ka janam lekar mauksh paaya.

Ulkamukh naam ka raja Dashrath hokar vaikunth ko prapt hua.

Sadhu naam ke vaishya ne Mordhwaj bankar apne putra ko aare se cheerkar moksh prapt kiya.

Maharaj Tungadhwaj ne swayam-bhu hokar Bhagwan ke bhaktyukt karm kar moksh ko prapt kiya.


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Laxmi Chalisa

Shri Laxmi Chalisa in hindi श्री लक्ष्‍मी चालीसा पाठ ( LAKSHMI CHALISA )

दोस्तों हम आपके लिए Shri Laxmi Chalisa in hindi लेके आएं हैं। शुक्रवार का दिन माँ लक्ष्मी का दिन माना गया है और इस दिन Shri LAKSHMI CHALISA का पाठ और आरती करना काफी शुभ माना जाता है।

नीचे श्री Laxmi Chalisa हिंदी में दी गयी है।

Shri Laxmi Chalisa ( Ma Lakshmi Chalisa )

दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।

मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥

॥ चौपाई ॥

सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।

ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

सोरठा

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।

सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।

ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥


तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥

जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥1||

तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥

जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥2 ||

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥३||

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥4 ||

क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥5 ||

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥6 ||

तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥7 ||

तुम सम प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥8 ||

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥9 ||

ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥

त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥१०||

जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥

ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।11 ||

पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥

विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥12 ||

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥13||

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥ 14 ||

बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥15 ||

जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥16 ||

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥

भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥17 ||

बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥ 18 ||

रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥

रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥ 19 ||

।। दोहा ।।

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥

।। इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णम।।


श्री लक्ष्मी सूक्तम पाठ – Shri Lakshmi Suktam – श्री लक्ष्मीसूक्तम्‌ पाठ


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hanuman ji ki aarti

Hanuman Chalisa Meaning ( Hindi and English )

Lord Hanuman is one of our favorite god. We believe that Lord Hanuman has lived on earth for ages and continues to live on earth to protect us from all difficulties. Hanuman chalisa is a set of 40 chaupais written by Shri Tulsidas dedicated to Lord Hanuman and is one of the most powerful prayers. Most of us know these chaupais by heart, but many of is do not know it’s meaning. This article is about Hanuman Chalisa meaning in Hindi and English.

दुनिया रचने वाले को भगवान कहते हैं और संकट हरने वाले को हनुमान कहते हैं। जय श्री राम।

 Hanuman Chalisa meaning

Hanuman Chalisa Meaning

Hanuman Chalisa Chaupai (In Hindi)Hanuman Chalisa Meaning in HindiHanuman Chalisa Meaning in English
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।With the Dust of the Lotus Feet of Sri Gurudeva, I Clean the Mirror of my Mind.
I Narrate the Sacred Glory of Sri Raghubar (Sri Rama Chandra), who Bestows the Four Fruits of Life (Dharma, Artha, Kama and Moksha).
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।
हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूं। आप तो जानते ही हैं कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्‍बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुखों व दोषों का नाश कार दीजिए।Considering Myself as Ignorant, I Meditate on You, O Pavan Kumar (Hanuman).
Bestow on me Strength, Wisdom and Knowledge, and Remove my Afflictions and Blemishes.
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुं लोक उजागर॥1॥श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों, स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।Victory to You, O Hanuman, Who is the Ocean of Wisdom and Virtue,
Victory to the Lord of the Monkeys, Who is the Enlightener of the Three Worlds.
राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नहीं है।You are the Messenger of Sri Rama possessing Immeasurable Strength,
You are Known as Anjani-Putra (son of Anjani) and Pavana-Suta (son of Pavana, the wind-god).
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥हे महावीर बजरंग बली!आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालों के साथी, सहायक है।You are a Great Hero, extremely Valiant, and body as strong as Thunderbolt,
You are the Dispeller of Evil Thoughts and Companion of Good Sense and Wisdom.
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।You possess a Golden Hue, and you are Neatly Dressed,
You wear Ear-Rings and have beautiful Curly Hair.
हाथबज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ साजै॥5॥ आपके हाथ में बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।You hold the Thunderbolt and the Flag in your Hands.
You wear the Sacred Thread across your Shoulder.
शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥ शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर में वन्दना होती है।You are the Incarnation of Lord Shiva and Son of Kesari,
You are Adored by the whole World on account of your Great Strength and Courage.
विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम के काज करने के लिए आतुर रहते है।You are Learned, Virtuous and Extremely Intelligent,
You are always Eager to do the Works of Sri Rama.
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥आप श्री राम चरित सुनने में आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय में बसे रहते है।You Delight in Listening to the Glories of Sri Rama,
You have Sri Rama, Sri Lakshmana and Devi Sita Dwelling in your Heart.
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रूप धरि लंक जरावा॥9॥





आपने अपना बहुत छोटा रूप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके लंका को जलाया।You Appeared before Devi Sita Assuming a Diminutive Form (in Lanka),
You Assumed an Awesome Form and Burnt Lanka.
भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥आपने विकराल रूप धारण करके राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उद्‍देश्यों को सफल कराया।You Assumed a Gigantic Form and Destroyed the Demons,
Thereby Accomplishing the Task of Sri Rama.
लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।You Brought the Sanjivana herb and Revived Sri Lakshmana.
Because of this Sri Rama Embraced You overflowing with Joy.
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।Sri Rama Praised You Greatly,
And said: “You are as dear to me as my brother Bharata”.
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥13॥श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।The Thousand Headed Seshnag Sings Your Glory”,
Said Sri Rama to You taking you in his Embrace.
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद, सारद सहित अहीसा॥14॥श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।Sanaka and other Sages, Lord Brahma and other Gods,
Narada, Devi Saraswati and Seshnag
 …
जम कुबेर दिगपाल जहां ते, कबि कोबिद कहि सके कहां ते॥15॥यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।Yama (god of death), Kubera (god of wealth), Digpalas (the guardian deities),
Poets and Scholars have not been able to Describe Your Glories in full
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥आपने सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।You Rendered a great Help to Sugriva.
You Introduced him to Sri Rama and thereby Gave back his Kingdom.
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना॥17॥आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।Vibhisana Followed your Advice,
And the Whole World Knows that he became the King of Lanka
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है कि उस पर पहुंचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझकर निगल लिया।The Sun which was at a distance of Sixteen Thousand Miles,
You Swallowed It (the Sun) thinking it to be a Sweet Fruit.
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुंह में रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।Carrying Lord Sri Rama’s Ring in your Mouth,
You Crossed the Ocean, no Wonder in that.
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥ संसार में जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।All the Difficult Tasks in this World,
Are Rendered Easy by your Grace.
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसा रे॥21॥श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले है, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता अर्थात् आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।You are the Gate-Keeper of Sri Rama’s Kingdom.
No one can Enter without Your Permission.
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना ॥22॥जो भी आपकी शरण में आते है, उस सभी को आनन्द प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक है, तो फिर किसी का डर नहीं रहता।Those who take Refuge in You enjoy all Happiness.
If You are the Protector, what is there to Fear?
आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक तें कांपै॥23॥आपके सिवाय आपके वेग को कोई नहीं रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप जाते है।You alone can Control Your Great Energy.
When you Roar, the Three Worlds Tremble.
भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥जहां महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहां भूत, पिशाच पास भी नहीं फटक सकते।Ghosts and Evil Spirits will Not Come Near,
When one Utters the Name of Mahavir (Hanuman).
नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥25॥वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।You Destroy Diseases and Remove all Pains,
When one Utters your Name Continuously.
संकट से हनुमान छुडावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥26
हे हनुमान जी! विचार करने में, कर्म करने में और बोलने में, जिनका ध्यान आपमें रहता है, उनको सब
संकटों से आप छुड़ाते है
Hanuman Frees one from Difficulties,
When one Meditates on Him with Mind, Deed and Words.
सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥27॥तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यों को आपने सहज में कर दिया।Sri Rama is the King of the Tapaswis (devotees engaged in penances).
And You (Hanuman) Fulfill all Works of Sri Rama (as a caretaker)
और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करें तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन में कोई सीमा नहीं होती।Devotees who have any Other Desires,
Will ultimately get the Highest Fruit of Life.
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में आपका यश फैला हुआ है, जगत में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।Your Glory prevails in all the Four Ages.
And your Fame Radiates throughout the World.
साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥हे श्री राम के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।You are the Saviour of the Saints and Sages.
You Destroy the Demons, O Beloved of Sri Rama.
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥31॥आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते
है।
1.) अणिमा- जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में प्रवेश कर जाता है।
2.) महिमा- जिसमें योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।
3.) गरिमा- जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।
4.) लघिमा- जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।
5.) प्राप्ति- जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।
6.) प्राकाम्य- जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है।
7.) ईशित्व- जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य हो जाता है।
8.) वशित्व- जिससे दूसरों को वश में किया जाता है।
You can Give the Eight Siddhis (supernatural powers) and Nine Nidhis (types of devotions).
Mother Janaki (Devi Sita) gave this Boon to you
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण में रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।You hold the Essence of Devotion to Sri Rama.
You Always Remain as the Servant of Raghupati (Sri Rama).
तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥आपका भजन करने से श्री राम जी प्राप्त होते है और जन्म जन्मांतर के दुख दूर होते है।Through Devotion to You, one gets Sri Rama,
Thereby getting Free of the Sorrows of Life after Life.
अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलाएंगे।At the End one Goes to the Abode of Raghupati (Sri Rama).
Where one is Known as the Devotee of Hari.
और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नहीं रहती।Even without Worshipping any Other Deities,
One Gets All Happiness who Worships Sri Hanuman.
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।Difficulties Disappear and Sorrows are Removed,
For Those who Contemplate on the Powerful Sri Hanuman.
जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।Victory, Victory, Victory to You, O Hanuman,
Please Bestow your Grace as our Supreme Guru.
जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई॥38॥जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बंधनों से छूट जाएगा और उसे परमानन्द मिलेगा।Those who Recite this Hanuman Chalisa one hundred times (with devotion),
Will get Freed from Worldly Bondage and get Great Happiness.
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है, कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।Those who Read the Hanuman Chalisa (with devotion),
Will become Perfect, Lord Shiva is the Witness.
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मंह डेरा॥40॥हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है। इसलिए आप उसके हृदय में निवास कीजिए।Tulsidas who is Always the Servant of Hari.
Prays the Lord to Reside in his Heart.
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सूरभूप॥हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनंद मंगलों के स्वरूप हैं। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।Sri Hanuman, who is the Son of Pavana, who Removes Difficulties,
Who has an Auspicious Form,
With Sri Rama, Sri Lakshmana and Devi Sita,
Please Dwell in my Heart.
Hanuman Chalisa Chaupais and its meanings

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Ganesh Chalisa

Ganesh Chalisa – Hindi and English text

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Shri Ganesh Chalisa / श्री गणेश चालीसा

ganpati chalisa

Ganesh chalisa in hindi / गणेश चालीसा हिंदी में

जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल।

विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥

जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥

ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।

अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥

पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥

गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज शिर लाए॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन भरमि भुलाई। रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥

मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुँ कौन बिधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

दोहा

श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥

सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥

Ganesh chalisa in english

Jai Ganapati Sadguna Sadan,
Kavivar Badan Kripaal,
Vighna Haran Mangal Karan,
Jai Jai Girijaalaal

Jai Jai Jai Ganapati Ganaraaju,
Mangal Bharana Karana Shubha Kaajuu,
Jai Gajbadan Sadan Sukhdaata,
Vishva Vinaayaka Buddhi Vidhaataa

VakraTunda Shuchi Shunda Suhaavana,
Tilaka Tripunda bhaal Man Bhaavan,
Raajata Mani Muktana ura maala,
Swarna Mukuta Shira Nayana Vishaalaa

Pustak Paani Kuthaar Trishuulam,
Modaka Bhoga Sugandhit Phuulam,
Sundara Piitaambar Tana Saajit,
Charana Paadukaa Muni Man Raajit

Dhani Shiva Suvan Shadaanana Bhraataa,
Gaurii Lalan Vishva-Vikhyaata,
Riddhi Siddhi Tav Chanvar Sudhaare,
Mooshaka Vaahan Sohat Dvaare

Kahaun Janma Shubh Kathaa Tumhari,
Ati Shuchi Paavan Mangalkaarii,
Ek Samay Giriraaj Kumaarii,
Putra Hetu Tapa Kiinhaa Bhaarii

Bhayo Yagya Jaba Poorana Anupaa,
Taba Pahunchyo Tuma Dhari Dvija Rupaa,
Atithi Jaani Kay Gaurii Sukhaarii,
Bahu Vidhi Sevaa Karii Tumhaarii

Ati Prasanna Hvai Tum Vara Diinhaa,
Maatu Putra Hit Jo Tap Kiinhaa,
Milhii Putra Tuhi, Buddhi Vishaala,
Binaa Garbha Dhaarana Yahi Kaalaa

Gananaayaka Guna Gyaan Nidhaanaa,
Puujita Pratham Roop Bhagavaanaa,
Asa Kehi Antardhyaana Roop Hvai,
Palanaa Par Baalak Svaroop Hvai

BaniShishuRudanJabahiTum Thaanaa,
Lakhi Mukh Sukh Nahin Gauri Samaanaa,
Sakal Magan Sukha Mangal Gaavahin,
Nabha Te Suran Suman Varshaavahin

Shambhu Umaa Bahudaan Lutaavahin,
Sura Munijana Suta Dekhan Aavahin,
Lakhi Ati Aanand Mangal Saajaa,
Dekhan Bhii Aaye Shani Raajaa

Nija Avaguna Gani Shani Man Maahiin,
Baalak Dekhan Chaahat Naahiin,
Girijaa Kachhu Man Bheda Badhaayo,
Utsava Mora Na Shani Tuhi Bhaayo

Kahana Lage Shani Man Sakuchaai,
Kaa Karihau Shishu Mohi Dikhayii,
Nahin Vishvaasa Umaa Ura Bhayauu,
Shani Son Baalak Dekhan Kahyau

Padatahin Shani Drigakona Prakaashaa,
Baalak Sira Udi Gayo Aakaashaa,
Girajaa Girii Vikala Hvai Dharanii,
So Dukha Dashaa Gayo Nahin Varanii

Haahaakaara Machyo Kailaashaa,
Shani Kiinhon Lakhi Suta Ko Naashaa,
Turat Garuda Chadhi Vishnu Sidhaaye,
Kaati Chakra So GajaShira Laaye

Baalak Ke Dhada Uupar Dhaarayo,
Praana Mantra Padhi Shankar Daarayo,
Naama’Ganesha’ShambhuTabaKiinhe,
Pratham Poojya Buddhi Nidhi Vara Diinhe

Buddhi Pariikshaa Jab Shiva Kiinhaa,
Prithvii Kar Pradakshinaa Liinhaa,
Chale Shadaanana Bharami Bhulaai,
Rache Baithii Tum Buddhi Upaai

Charana Maatu-Pitu Ke Dhara Liinhen,
Tinake Saat Pradakshina Kiinhen
Dhani Ganesha Kahi Shiva Hiye Harashyo,
Nabha Te Suran Suman Bahu Barse

Tumharii Mahima Buddhi Badaai,
Shesha Sahasa Mukha Sake Na Gaai,
Main Mati Heen Maliina Dukhaarii,
Karahun Kaun Vidhi Vinaya Tumhaarii

Bhajata ‘Raamsundara’ Prabhudaasaa,
Jaga Prayaaga Kakraa Durvaasaa,
Ab Prabhu Dayaa Deena Par Keejai,
Apnii Bhakti Shakti Kuchha Deejai

ll Dohaa ll

Shrii Ganesha Yeh Chaalisaa, Paatha Karre Dhara Dhyaan l
Nita Nav Mangala Graha Base, Lahe Jagat Sanmaana ll


Anup jalota ganesh chalisa

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Ganesh Aarti in hindi / गणेश आरती हिंदी में – jay ganesh jay ganesh deva

Please find Ganesh Ji Ki aarti lyrics in hindi – jai ganesh jai ganesh , jai ganesh deva

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

एकदंत, दयावन्त, चार भुजाधारी,
माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी। 

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।। ..

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया। 

‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।। 
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा .. 
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा। 

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी। 
कामना को पूर्ण करो जय बलिहारी।


Ganesh ji ki aarti English Lyrics

Please find Ganesh Ji Ki Aarti text in english

Jai Ganesh, Jai Ganesh,Jai Ganesh Deva।

Mata Jaki Parvati,Pita Mahadeva॥

Ekadanta Dayavanta,Char Bhujadhaari।

Mathe Par Tilak Sohe,Muse Ki Savari॥

Haar Chade, Phool Chade ,Aur Chade Meva।

Ladduan Ka Bhog Lage,Sant Karein Seva॥

Jai Ganesh, Jai Ganesh,Jai Ganesh Deva।

Mata Jaki Parvati,Pita Mahadeva॥

Andhe Ko Aankh Deta,Korhina Ko Kaya।

Banjhan Ko Putra Deta,Nirdhan Ko Maya॥

‘Soora’ Shyama Sharana Aaye,Saphal Kije Seva।

Mata Jaki Parvati,Pita Mahadeva॥

Deenana Ki Laaj Rakho,Shambhu Sutavari।

Kaamana Ko Poorna KaroJaga Balihari॥

Jai Ganesh, Jai Ganesh,Jai Ganesh Deva।

Mata Jaki Parvati,Pita Mahadeva॥

Sukhakarta Dukhaharta – गणेश आरती मराठी में – Ganesh Aarti in Maathi

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सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची

नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची

कंठी झलके माल मुक्ता फलांची।

जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव

जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति

दर्शन मात्रे मन कामना पूर्ती। जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा

चंदनाची उटी कुमकुम केशरा

हीरे जड़ित मुकुट शोभतो बरा

रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया।

जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव

जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति

दर्शन मात्रे मन कामना पूर्ती। जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव

लम्बोदर पीताम्बर फणिवर बंधना

सरल सोंड वक्र तुंड त्रिनयना

दास रामाचा वाट पाहे सदना

संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुर वर वंदना।

जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव

जयदेव जयदेव जय मंगलमूर्ति

दर्शन मात्रे मन कामना पूर्ती। जयदेव जयदेव जयदेव जयदेव ।


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108 Names for Lord Ganesha

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108 names of ganesha in Hindi

1. बालगणपति : सबसे प्रिय बालक
2. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो
3. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान
4. धूम्रवर्ण : धुंए को उड़ाने वाले 
5. एकाक्षर : एकल अक्षर
6. एकदन्त: एक दांत वाले
7. गजकर्ण : हाथी की तरह आंखों वाले
8. गजानन: हाथी के मुख वाले भगवान
9. गजवक्र : हाथी की सूंड वाले 
10. गजवक्त्र:  हाथी की तरह मुंह है
11. गणाध्यक्ष : सभी जनों के मालिक
12. गणपति : सभी गणों के मालिक
13. गौरीसुत : माता गौरी के बेटे 
14. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले देव
15. लम्बोदर : बड़े पेट वाले 
16. महाबल : अत्यधिक बलशाली  
17. महागणपति : देवादिदेव
18. महेश्वर: सारे ब्रह्मांड के भगवान
19. मंगलमूर्ति : सभी शुभ कार्यों के देव
20. मूषकवाहन : जिनका सारथी मूषक है
21. निदीश्वरम : धन और निधि के दाता
22. प्रथमेश्वर : सब के बीच प्रथम आने वाले 
23. शूपकर्ण : बड़े कान वाले देव
24. शुभम : सभी शुभ कार्यों के प्रभु
25. सिद्धिदाता:  इच्छाओं और अवसरों के स्वामी
26. सिद्दिविनायक : सफलता के स्वामी
27. सुरेश्वरम : देवों के देव। 
28. वक्रतुण्ड : घुमावदार सूंड वाले 
29. अखूरथ : जिसका सारथी मूषक है
30. अलम्पता : अनन्त देव। 
31. अमित : अतुलनीय प्रभु
32. अनन्तचिदरुपम : अनंत और व्यक्ति चेतना वाले 
33. अवनीश : पूरे विश्व के प्रभु
34. अविघ्न : बाधाएं हरने वाले। 
35. भीम : विशाल
36. भूपति : धरती के मालिक  
37. भुवनपति: देवों के देव। 
38. बुद्धिप्रिय : ज्ञान के दाता 
39. बुद्धिविधाता : बुद्धि के मालिक
40. चतुर्भुज: चार भुजाओं वाले
41. देवादेव : सभी भगवान में सर्वोपरि 
42. देवांतकनाशकारी: बुराइयों और असुरों के विनाशक
43. देवव्रत : सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले
44. देवेन्द्राशिक : सभी देवताओं की रक्षा करने वाले
45. धार्मिक : दान देने वाले 
46. दूर्जा : अपराजित देव
47. द्वैमातुर : दो माताओं वाले
48. एकदंष्ट्र: एक दांत वाले
49. ईशानपुत्र : भगवान शिव के बेटे
50. गदाधर : जिनका हथियार गदा है
51. गणाध्यक्षिण : सभी पिंडों के नेता
52. गुणिन: सभी गुणों के ज्ञानी
53. हरिद्र : स्वर्ण के रंग वाले
54. हेरम्ब : मां का प्रिय पुत्र
55. कपिल : पीले भूरे रंग वाले 
56. कवीश : कवियों के स्वामी
57. कीर्ति : यश के स्वामी
58. कृपाकर : कृपा करने वाले
59. कृष्णपिंगाश : पीली भूरी आंख वाले
60. क्षेमंकरी : माफी प्रदान करने वाला
61. क्षिप्रा : आराधना के योग्य
62. मनोमय : दिल जीतने वाले
63. मृत्युंजय : मौत को हराने वाले
64. मूढ़ाकरम : जिनमें खुशी का वास होता है
65. मुक्तिदायी : शाश्वत आनंद के दाता
66. नादप्रतिष्ठित : जिन्हें संगीत से प्यार हो
67. नमस्थेतु : सभी बुराइयों पर विजय प्राप्त करने वाले
68. नन्दन: भगवान शिव के पुत्र  
69. सिद्धांथ: सफलता और उपलब्धियों के गुरु
70. पीताम्बर : पीले वस्त्र धारण करने वाले 
71. प्रमोद : आनंद

72. पुरुष : अद्भुत व्यक्तित्व
73. रक्त : लाल रंग के शरीर वाले 
74. रुद्रप्रिय : भगवान शिव के चहेते
75. सर्वदेवात्मन : सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकर्ता  
76) सर्वसिद्धांत : कौशल और बुद्धि के दाता
77. सर्वात्मन : ब्रह्मांड की रक्षा करने वाले 
78. ओमकार : ओम के आकार वाले 
79. शशिवर्णम : जिनका रंग चंद्रमा को भाता हो
80. शुभगुणकानन : जो सभी गुणों के गुरु हैं
81. श्वेता : जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध हैं 
82. सिद्धिप्रिय : इच्छापूर्ति वाले
83. स्कन्दपूर्वज : भगवान कार्तिकेय के भाई
84. सुमुख : शुभ मुख वाले
85. स्वरूप : सौंदर्य के प्रेमी
86. तरुण : जिनकी कोई आयु न हो
87. उद्दण्ड : शरारती
88. उमापुत्र : पार्वती के पुत्र 
89. वरगणपति : अवसरों के स्वामी
90. वरप्रद : इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता
91. वरदविनायक: सफलता के स्वामी
92. वीरगणपति : वीर प्रभु
93. विद्यावारिधि : बुद्धि के देव
94. विघ्नहर : बाधाओं को दूर करने वाले
95. विघ्नहत्र्ता: विघ्न हरने वाले 
96. विघ्नविनाशन : बाधाओं का अंत करने वाले
97. विघ्नराज : सभी बाधाओं के मालिक
98. विघ्नराजेन्द्र : सभी बाधाओं के भगवान
99. विघ्नविनाशाय : बाधाओं का नाश करने वाले 
100. विघ्नेश्वर :  बाधाओं के हरने वाले भगवान
101. विकट : अत्यंत विशाल
102. विनायक : सब के भगवान
103. विश्वमुख : ब्रह्मांड के गुरु
104. विश्वराजा : संसार के स्वामी
105. यज्ञकाय : सभी बलि को स्वीकार करने वाले 
106. यशस्कर : प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107. यशस्विन : सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव
108.  योगाधिप : ध्यान के प्रभु 


108 names of ganesha in English

1. Balganpati: One who is dearest child
2. Bhalchandra: One who has moon on his head
3. Budhinath: God of Wisdom
4. DhoomraVarna: One who can blow off smoke
5. Ekakshar : One who is known by a single letter
6. Ekdant: One who has one teeth
7. Gajkarna: One who is Elephant eyed
8. Gajanan: Elephant faced god
9. Gajwakra: God with elephant trunk
10. Gajavaktra:  One with elephant face
11. Ganadhakshya: One who is leader of all people
12. Ganapati: One who is blesses with all gana’s
13. Gaurisut: Mata Gauri’s son
14. Lambkarna: The God with Big Ears
15. Lambodar: one with big belly
16. Mahabal: One who is very very strong
17. Mahaganapathi: Devadidev
18. Maheshwar: Lord of the Universe
19.Mangalamurthy: God of all auspicious works
20.Mushkavahan: Whose charioteer is a mouse
21. Nidiswaram: Donors of Money and Funds
22. Prathameshwar: First among all
23. Shupakarna: Dev with big ears
24. Shubham: Lord of all auspicious actions
25. Siddhidata: Owner of desires and opportunities
26. Siddivinayak: Master of Success
27. Sureswaram: God of Gods.
28. Vakratund: one with curved trunk
29. Akhurath: Whose charioteer is mouse
30. Alampta: Eternal God.
31. Amit: matchless lord
32. Anantachidarupam: One who is Infinite
33. Avnish: Lord of the whole world
34. Avighna: Lord who removes all your obstacles
35. Bheem: Some one who is big
36. Bhupathi: Lord of the earth
37. Bhuvanapati: God of Gods.
38. Budhipriya: Giver of knowledge
39. BudhiVidhata: master of wisdom
40. Chaturbhuja: Lord with fours bhujas
41. Devadeva: paramount in all God
42. DevantakNashkari: Destroyer of Evils and Asuras
43. Devavrata: Who accept austerity
44. Devendrashik: The Protector of All Gods
45. Dharmik
46. Durja: who cannot be defeated
47. Dwaymatur: having two mothers
48. Ekadashshtra: having one teeth
49.Ishanaputra: Son of Lord Shiva
50. Gadadhar: whose weapon is mace
51. GanadhyaShin: Leader of all bodies
52. Gunin: Knowledgeable of all qualities
53. Haridra: Golden colored
54. Heramb: Mother’s Beloved Son
55. Kapil: Some one who is Yellow Brown
56. Kavish: lord of poets
57. Kirti: Lord of Fame
58. Kripakar

  1. Krishnapingash: one with Yellow brown eyed
  2. Kshmankari: forgiver
  3. Kshipra: Worthy of Worship
  4. Manomoy: Heart Winners
  5. Mrityunjaya: Who defeats death
  6. Mudhakaram: Those who live in happiness
  7. Muktidayee: Giver of eternal bliss
  8. Nadpritist: Those who love music
  9. Namasthetu: conquerors of all evils
  10. Nandan: Son of Lord Shiva
  11. Siddhanth: Master of success and achievements
  12. Pitamber: Wearing yellow clothes
  1. Pramod: Anand
  2. Purush : Amazing personality
  3. Rakt: one with red color body
  4. Rudrapriya: Favorite of Lord Shiva
  5. Sarvadevatman: Acceptor of all heavenly offerings
  6. Sarvasiddhanta: giver of skill and intelligence
  7. Sarvatman: The protector of the universe
  8. Omkar: Om shaped
  9. Shasivaranam: whose color is pleasing to the moon
  10. Shubhagunakanan: One who is the master of all virtues
  1. Shweta: Those who are pure as white
  2. Siddhipriya: One who grants all wishes
  3. Skandapurvaj: Brother of Lord Karthikeya
  4. Sumukh: Auspicious ones
  5. Swaroop: one who is beautiful
  6. Tarun: Who has no age
  7. Uddand: Naughty
  8. Umaputra: Son of Parvati
  9. Varganapati: Lord of Opportunities
  10. Varprad: grantor of wishes and opportunities
  11. Varadavinayak: master of success
  12. Virganapati: Veer Prabhu
  13. Vidyavaridhi: God of Wisdom
  14. Vighnahar: Removing obstacles
  15. Vighnahatta: Remover of all obstacles
  16. Disruption: Enders of obstacles
  17. Vighnaraj: the master of all obstacles
  18. Vighnarajendra: Lord of all obstacles
  19. VighnaVinashan: Those who destroy obstacles
  20. Vighneshwar: God who defeats obstacles
  21. Vikat: extremely large
  22. Vinayaka: Lord of all
  23. Vishwamukh: Master of the universe
  24. Vishwaraja: Lord of the Worlds
  25. Yajnakaaya: Those who accept all sacrifices
  26. Yashaskar: the lord of fame and fortune
  27. Yashasvin: The most beloved and popular god
  28. Yogadhip: Lord of meditation

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मां दुर्गा के प्रभावशाली मंत्र : mytempletrips पे आपका स्वागत है और दोस्तों नीचे दिए गए माँ दुर्गा के मन्त्रों को जरूर ध्यान से जाप करें। ये मंत्र काफी प्रभावशाली है और माँ दुर्गा के ये मंत्र दुखों का नाश करने वाले हैं।

रोग नाश करने वाला मंत्र (Powerful Durga Mantra)

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान सकलानभीष्टान्।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता हाश्रयतां प्रयान्ति।

अर्थातः देवी! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके है। उनको विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं।

दु:ख-दारिद्र नाश करने वाला मंत्र (Powerful Durga Mantra)

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:। स्वस्थै स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।।

द्रारिद्र दु:ख भयहारिणि का त्वदन्या। सर्वोपकारकारणाय सदाह्यद्र्रचिता।।

ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, संपदा प्राप्ति एवं शत्रु भय मुक्ति-मोक्ष प्रदान करने वाला मंत्र

ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।

शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥

भय नाशक दुर्गा मंत्र (Powerful Durga Mantra)

सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते,

भयेभ्यास्त्रहिनो देवी दुर्गे देवी नमोस्तुते।

स्वप्न में कार्य सिद्धि-असिद्धि जानने के लिए

दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थ साधिके।

मम सिद्घिमसिद्घिं वा स्वप्ने सर्व प्रदर्शय।।

अर्थातः शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवी हम पर प्रसन्न होओ। संपूर्ण जगत माता प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरी! विश्व की रक्षा करो। देवी! तुम्ही चराचर जगत की अधिश्वरी हो।

मां के कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन

सृष्टिस्थिति विनाशानां शक्तिभूते सनातनि।

गुणाश्रये गुणमये नारायणि! नमोऽस्तुते॥

अर्थातः हे देवी नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम सृष्टि पालन और संहार की शक्तिभूता सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणी! तुम्हें नमस्कार है।



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Shri Durga Chalisa - श्री दुर्गा चालीसा

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Shri Durga Chalisa in Hindi

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूं लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा तुम जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरा रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुंलोक में डंका बाजत॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ संतन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावें।
रिपू मुरख मौही डरपावे॥

शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।
जब लगि जिऊं दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

Shri Durga Chalisa in English

Namo namo Durge sukh karani,
Namo namo Ambe dukh harani.
Nirankar hai jyoti tumhari
Tihun lok pheli ujayari.

Shashi lalat mukh maha vishala,
Netra lal brikuti vikrala.

Roop matu ko adhika suhave,
Daras karat jan ati sukh pave.

Tum sansar shakti laya kina,
Palan hetu anna dhan dina.

Annapurna hui jag pala,
Tumhi adi sundari bala.

Pralaya kal sab nashan hari,
Tum Gauri Shiv Shankar pyari.

Shiv yogi tumhare gun gave,
Brahma Vishnu tumhe nit dhyaven.

Roop Saraswati ko tum dhara,
De subudhi rishi munin ubara

Dhara roop Narsimha ko Amba,
Pragat bhayin phar kar kamba.

Raksha kari Prahalad bachayo,
Hiranakush ko swarg pathayo.

Lakshmii roop dharo jag mahi,
Shree Narayan ang samahi

Sheer Sindhu me karat vilasa,
Daya Sindhu deejay man aasa

Hingalaj mein tumhi Bhavani,
Mahima amit na jaat bakhani

Matangi Dhoomavati Mata,
Bhuvneshwari Bagala Sukhdata

Shree Bairav Tara jog tarani,
Chin-na Bhala bhav dukh nivarani.

Kehari Vahan soh Bhavani,
Langur veer chalat agavani

Kar men khappar khadag viraje,
Jako dekh kal dar bhaje.

Sohe astra aur trishoola,
Jase uthata shatru hiya shoola


Nagarkot mein tumhi virajat,
Tihun lok mein danka bajat

Shumbhu Nishumbhu Danuja tum mare
Rakta-beeja shankhan samhare.


Mahishasur nripa ati abhimani,
Jehi agha bhar mahi akulani

Roop kaaral Kalika dhara,
Sen sahit tum tin tihi samhara

Pari garh santan par jab jab,
Bhayi sahaya Matu tum tab tab

Amarpuri aru basava loka,
Tava mahima sab rahen asoka

Jwala mein hai jyoti tumhari,
Tumhen sada pooje nar nari

Prem bhakti se jo yash gaye,
Dukh-daridra nikat nahin aave

Dhyave tumhen jo nar man laee,
Janam-maran tako chuti jaee.

Jogi sur-muni kahat pukari,
Jog na ho bin shakti tumhari

Shankar Aacharaj tap keenhon,
Kam, krodh jeet sab leenhon

Nisidhin dhyan dharo Shanker ko,
Kahu kal nahin sumiron tum ko

Shakti roop ko maram na payo,
Shakti gayi tab man pachitayo

Sharnagat hui keerti bakhani,
Jai jai jai Jagdamb Bhavani

Bhayi prasanna Aadi Jagdamba,
Dayi shakti nahin keen vilamba

Mokun Matu kashta ati ghero,
Tum bin kaun hare dukh mero

Asha trishna nipat sataven,
Moh madadik sab binsaven

Shatru nash keeje Maharani,
Sumiron ikchit tumhi Bhavani

Karo kripa hey Matu dayala
Riddhi-Siddhi de karahu nihala

Jab lagi jiyoon daya phal paoon,
Tumro yash mein sada sunaoon,


Durga chalisa jo gaye,
Sab sukh bhog parampad pave

Devidas sharan nij jani,
Karahu kripa Jagdamb Bhavani


शरणागत रक्षा करें , भक्त रहे निःशंक , मै आया तेरी शरण में माता लीजे अंक

|| जय दुर्गा मइया ||


Friends, Shri Durga Chalisa , श्री दुर्गा चालीसा is a very powerful way to start your day. Do recite Shri Durga Chalisa daily and seek Ma Durgas blessings.

Jai Mata ki!


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श्री दुर्गा कवच – Ma Durga Kavach – Durga Kavach hindi (Chaupai) & sanskrit text

Ma Durga Kavach in Hindi – जय माता की दोस्तों। माँ दुर्गा के भक्तों को माँ दुर्गा के कवच का महत्व बताने की जरूरत नहीं है। यह कवच से माँ दुर्गा की स्तुति करने से मन के सरे डर खत्म हो जाते है। यह कवच आपके और आपके परिवार को सुरक्षा प्रदान करना है। अगर आप Durga Kavach hindi text खोज रहे हैं तो हम नीचे Ma Durga Kavach का हिंदी में पाठ दे रहे हैं जिसे आप डाउनलोड भी कर सकते हैं।


माँ दुर्गा कवच – Ma Durga Kavach ( In Hindi – )

॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥

॥जय माता की ॥

ऋषि मार्कंड़य ने पूछा जभी !
दया करके ब्रह्माजी बोले तभी !!
के जो गुप्त मंत्र है संसार में !
हैं सब शक्तियां जिसके अधिकार में !!
हर इक का कर सकता जो उपकार है !
जिसे जपने से बेडा ही पार है !!
पवित्र कवच दुर्गा बलशाली का !
जो हर काम पूरे करे सवाल का !!
सुनो मार्कंड़य मैं समझाता हूँ !
मैं नवदुर्गा के नाम बतलाता हूँ !!
कवच की मैं सुन्दर चोपाई बना !
जो अत्यंत हैं गुप्त देयुं बता !!
नव दुर्गा का कवच यह, पढे जो मन चित लाये !
उस पे किसी प्रकार का, कभी कष्ट न आये !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
पहली शैलपुत्री कहलावे !
दूसरी ब्रह्मचरिणी मन भावे !!
तीसरी चंद्रघंटा शुभ नाम !
चौथी कुश्मांड़ा सुखधाम !!
पांचवी देवी अस्कंद माता !
छटी कात्यायनी विख्याता !!
सातवी कालरात्रि महामाया !
आठवी महागौरी जग जाया !!
नौवी सिद्धिरात्रि जग जाने !
नव दुर्गा के नाम बखाने !!
महासंकट में बन में रण में !
रुप होई उपजे निज तन में !!
महाविपत्ति में व्योवहार में !
मान चाहे जो राज दरबार में !!
शक्ति कवच को सुने सुनाये !
मन कामना सिद्धी नर पाए !!
चामुंडा है प्रेत पर, वैष्णवी गरुड़ सवार !
बैल चढी महेश्वरी, हाथ लिए हथियार !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
हंस सवारी वारही की !
मोर चढी दुर्गा कुमारी !!
लक्ष्मी देवी कमल असीना !
ब्रह्मी हंस चढी ले वीणा !!
ईश्वरी सदा बैल सवारी !
भक्तन की करती रखवारी !!
शंख चक्र शक्ति त्रिशुला !
हल मूसल कर कमल के फ़ूला !!
दैत्य नाश करने के कारन !
रुप अनेक किन्हें धारण !!
बार बार मैं सीस नवाऊं !
जगदम्बे के गुण को गाऊँ !!
कष्ट निवारण बलशाली माँ !
दुष्ट संहारण महाकाली माँ !!
कोटी कोटी माता प्रणाम !
पूरण की जो मेरे काम !!
दया करो बलशालिनी, दास के कष्ट मिटाओ !
चमन की रक्षा को सदा, सिंह चढी माँ आओ !!
कहो जय जय जय महारानी की !
जय दुर्गा अष्ट भवानी की !!
अग्नि से अग्नि देवता !
पूरब दिशा में येंदरी !!
दक्षिण में वाराही मेरी !
नैविधी में खडग धारिणी !!
वायु से माँ मृग वाहिनी !
पश्चिम में देवी वारुणी !!
उत्तर में माँ कौमारी जी!
ईशान में शूल धारिणी !!
ब्रहामानी माता अर्श पर !
माँ वैष्णवी इस फर्श पर !!
चामुंडा दसों दिशाओं में, हर कष्ट तुम मेरा हरो !
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
सन्मुख मेरे देवी जया !
पाछे हो माता विजैया !!
अजीता खड़ी बाएं मेरे !
अपराजिता दायें मेरे !!
नवज्योतिनी माँ शिवांगी !
माँ उमा देवी सिर की ही !!
मालाधारी ललाट की, और भ्रुकुटी कि यशर्वथिनी !
भ्रुकुटी के मध्य त्रेनेत्रायम् घंटा दोनो नासिका !!
काली कपोलों की कर्ण, मूलों की माता शंकरी !
नासिका में अंश अपना, माँ सुगंधा तुम धरो !!
संसार में माता मेरी, रक्षा करो रक्षा करो !!
ऊपर वाणी के होठों की !
माँ चन्द्रकी अमृत करी !!
जीभा की माता सरस्वती !
दांतों की कुमारी सती !!
इस कठ की माँ चंदिका !
और चित्रघंटा घंटी की !!
कामाक्षी माँ ढ़ोढ़ी की !
माँ मंगला इस बनी की !!
ग्रीवा की भद्रकाली माँ !
रक्षा करे बलशाली माँ !!
दोनो भुजाओं की मेरे, रक्षा करे धनु धारनी !
दो हाथों के सब अंगों की, रक्षा करे जग तारनी !!
शुलेश्वरी, कुलेश्वरी, महादेवी शोक विनाशानी !
जंघा स्तनों और कन्धों की, रक्षा करे जग वासिनी !!
हृदय उदार और नाभि की, कटी भाग के सब अंग की !
गुम्हेश्वरी माँ पूतना, जग जननी श्यामा रंग की !!
घुटनों जन्घाओं की करे, रक्षा वो विंध्यवासिनी !
टकखनों व पावों की करे, रक्षा वो शिव की दासनी !!
रक्त मांस और हड्डियों से, जो बना शरीर !
आतों और पित वात में, भरा अग्न और नीर !!
बल बुद्धि अंहकार और, प्राण ओ पाप समान !
सत रज तम के गुणों में, फँसी है यह जान !!
धार अनेकों रुप ही, रक्षा करियो आन !
तेरी कृपा से ही माँ, चमन का है कल्याण !!
आयु यश और कीर्ति धन, सम्पति परिवार !
ब्रह्मणी और लक्ष्मी, पार्वती जग तार !!
विद्या दे माँ सरस्वती, सब सुखों की मूल !
दुष्टों से रक्षा करो, हाथ लिए त्रिशूल !!
भैरवी मेरी भार्या की, रक्षा करो हमेश !
मान राज दरबार में, देवें सदा नरेश !!
यात्रा में दुःख कोई न, मेरे सिर पर आये !
कवच तुम्हारा हर जगह, मेरी करे सहाए !!
है जग जननी कर दया, इतना दो वरदान !
लिखा तुम्हारा कवच यह, पढे जो निश्चय मान !!
मन वांछित फल पाए वो, मंगल मोड़ बसाए !
कवच तुम्हारा पढ़ते ही, नवनिधि घर मे आये !!
ब्रह्माजी बोले सुनो मार्कंड़य !
यह दुर्गा कवच मैंने तुमको सुनाया !!
रहा आज तक था गुप्त भेद सारा !
जगत की भलाई को मैंने बताया !!
सभी शक्तियां जग की करके एकत्रित !
है मिट्टी की देह को इसे जो पहनाया !!
चमन जिसने श्रद्धा से इसको पढ़ा जो !
सुना तो भी मुह माँगा वरदान पाया !!
जो संसार में अपने मंगल को चाहे !
तो हरदम कवच यही गाता चला जा !!
बियाबान जंगल दिशाओं दशों में !
तू शक्ति की जय जय मनाता चला जा !!
तू जल में तू थल में तू अग्नि पवन में !
कवच पहन कर मुस्कुराता चला जा !!
निडर हो विचर मन जहाँ तेरा चाहे !
चमन पाव आगे बढ़ता चला जा !!
तेरा मान धन धान्य इससे बढेगा !
तू श्रद्धा से दुर्गा कवच को जो गाए !!
यही मंत्र यन्त्र यही तंत्र तेरा !
यही तेरे सिर से हर संकट हटायें !!
यही भूत और प्रेत के भय का नाशक !
यही कवच श्रद्धा व भक्ति बढ़ाये !!
इसे निसदिन श्रद्धा से पढ़ कर !
जो चाहे तो मुह माँगा वरदान पाए !!
इस स्तुति के पाठ से पहले कवच पढे !
कृपा से आधी भवानी की, बल और बुद्धि बढे !!
श्रद्धा से जपता रहे, जगदम्बे का नाम !
सुख भोगे संसार में, अंत मुक्ति सुखधाम !!
कृपा करो मातेश्वरी, बालक चमन नादाँ !
तेरे दर पर आ गिरा, करो मैया कल्याण !!


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माँ दुर्गा कवच – Ma Durga Kavach ( In Sanskrit)

॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
ब्रह्मोवाच अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
माहेश्वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना। लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
श्वेतरुपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना। ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना। जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च। नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा। अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके। पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्। परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः। त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् । यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥


माँ दुर्गा कवच – Ma Durga Kavach on Youtube

ये एक बहुत ही अच्छा वीडियो है YOUTUBE पे। आप इस वीडियो को जरूर सुने और माँ दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करें। जय माता की !

Devi Kavacham 


सो दोस्तों – यह माँ दुर्गा का कवच जरूर पढ़िए और माँ का आशीर्वाद प्राप्त करिये। माँ दुर्गा का आशीर्वाद आपके जीवन में हमेशा बना रहे।

जय माता की !

Friends do read this Ma Durga Kavach. Jai Mata Ki !

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